अफसोस

आईने में अपना चहरा ढूँढते वक्त,
शीशे में हम अपना अक्स खोज पाए;
धूँदली यादों की तनहाई में,
हम बहते आँसूओं को न रोक पाए।

जो अपने हमें सर-आखों पे रखा करते थे,
आज वही हमें बेझिझक बद्दुआऐं देने लगे,
पता ही नहीं चला कब हम इतने गैर और पराए हो गए, की,
ऊपरवाले ने भी हमें खुशियाँ बख्शने से इनकार कर दिया।

गम के साए में पले-बड़े हैं ;
गम से हमें बैर नहीं,
शिकायत तो हमें अपने नसीब से है,
तराशने की आड़ में, हम खून बहाते गए,
और वह इम्तहान लेते गए।

खैरात में मांगा नहीं था सुकून,
कुछ अच्छे कर्म हमने भी किए थे,
सही गलत के संघर्ष में,
कुछ आवाज हमने भी उठाए थे।

अब मुकदमा भी आप ही चलाऐं
और फैसला भी आप ही सुनाएँ;
क्यूँकी थक चुके है हम;
अपने गली में तो बदनाम थे, है और ता उम्र रहेंगे,
जब उपरवाले ने हीं हम पर रहम नहीं बरसी,
आपका मोहल्ला हमें कौनसा आबाद करपाएगा !

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