अमावस का चांद

चौथ के चांद सा अधूरा सा था तू, मेरा इश्क़ तुझे पूरा शबाब कर गया। छन के आता था तेरा वजूद मुझ तक इश्क की छलनी में ,और यूँ बेदाग़ रहा तू पूनम की चांदनी जैसा। माह-ओ-साल बीते, मगर तू ना आया …अमावस गुजारी है हर चांद की रात हमने।

अमरीश सैनी

Leave a Reply

Your email address will not be published.