आज इतवार है ..!

ऐ दोनों आज भी आ गए पर आज तो इतवार है ना.!

रोज़ ही अपनी बालकनी में खड़े हो मैं सबेरे -सबेरे अक्सर उन दोनों को देखता हूँ  ,  बहुदा ही एक दया का भाव आ जाता है उन दोनों पे,

रोज़मर्रा की जिन्दगी में कई ऐसे मौके आते जब हमें ऐसे क्षणिक दया आती है पर ये सब क्षणिक ही तो होता है , कभी हम नज़रेे फेर लेते है , कभी एक आह निकाल के तो कभी यूँ ही हम उस दया भाव से निकल आते है और कुछ देर बाद तो वो दृश्य हमें याद तक नही रहता ।

मेरे लिए भी रोज़ की तरह उन दोनों का सामने वाले कूड़े के ढ़ेर में कुछ बीनना अचरज का विषय बिल्कुल ना था, वो तो रोज आते है।  याद मुझे पिछली ठण्ड मैने भी कुछ अपने  पुराने कपड़े ,जूते उनको दिये थे ,कुछ उन्होंने लिए कुछ उसी कूडे के ढ़ेर में फेंक कर वो दोनों चले गए थे।

बच्चे ही तो है मेरे कपडे उनको कहाँ से फिट होते और किसी और के लिए संजोने की समझ उनमें कहाँ होती है , मेरा भी मेट्रोपोलिटन इंसानियत इतनी ही जागी थी ,

हम सब शायद कुछ ऐसे ही बेमेल की सहायता कर अपने ईगो को सेटिस्फाई कर लेते है,

वैसे हम इनमें किसी की मदद् नही कर रहे होते है अपनी ही इच्छाओ और भावनाओ को पूरा करने का प्रयास करते है, संभवत एक नैतिक जीत की अभिलाषा होती है हमें।

पर आज ये दोनों यहाँ , यार आज तो इतवार है , हम अपने कूलर , ए सी में जानबूझ कर देर तक सोते है, आराम से उठकर, फ़ालतू टहलते है, हल्के मूड में अख़बार पढ़ते है , आराम से चाय की चुस्किया लेते है,

आराम तो आज का जन्म सिद्ध अधिकार है, क्योकि आज इतवार है।

पर क्या इनके पास इतवार भी नहीं है, सहसा मेरे अंदर से एक आवाज़ आई , आज ना जाने क्यों अपने क़दमो को उन नन्हे बच्चों तक जाने से रोक ना पाया ..!

एक लड़का है चार – पांच साल का और एक बच्ची है छः- सात साल की , हाँ बस इतनी ही उम्र होगी उन दोनों की।

कूड़े के ढ़ेर स अपने लिएे जिन्दगी चुनने आते है दोनों,

कितना समर्पण है इनमें या ग़रीबी समर्पण सिखा देता है..?

क्या इनके माँ – बाप इन्हे एक दिन की छूुटटी नही लेने देते होंगे , कब खेलते होंगे ये दोनों, क्या ज़िन्दगी होगी इनकी कितने ही सवालो से मैं घिर गया,

उन दोनों की मासूमियत और भोलापन देख मैं कुछ ना बोल सका , इतना करीब से नही देखा था तो उनका वो लड़कपन नही देख पाया मैं कभी भी,

हज़ार सवाल थे पर कुछ बोल पाने की हिम्मत मेरे में नही थी, आज लगा उनका दोषी तो मैं ही हूँ..!

क्यों , नही हूँ क्या ..? हम भी तो उसी सिस्टम का हिस्सा है जो इनके इस स्थिति का करक है,  वही सिस्टम जो शायद ही आवाज़ करता है,

पास पड़े कुछ ईटो पे बैठा मैं एक टक उन दोनों को देखे जा रहा था , बोलने की हिम्मत मुझमे अभी भी नही थी।

क्या देखते है भईया जी आप का कुछ खों गया है क्या..?

कितना मीठी बोली थी उस प्यारी सी बच्ची की

बताइये ना भईया मैं ख़ोज के देती हूँ ..!

नही बेटा कुछ नही खोया आप को देख रहा हूँ,

क्या हुआ भईया मैं.. मैं अभी चली जाती हूँ, मैं चोर नही हूँ.., वो सहम सी गई,

नही, नही डरो नही जो कर रही हो करो , मेरे आँखो में आँशु थे, क्या जीवट था जो ख़ुद कूड़े में ज़िन्दगी तलाश रहा है वो बड़ी हिम्मत से बोल रही थी कि वो कुछ भी खोज के मुझे दे सकती है,

बेटा आज आप कूड़ा कहाँ बेचती है ..? आज तो दुकान बंद होती है ना..?

नही भईया हमारा वाला कबाड़ी शाम को खोलता है ,

कितना मिलता है एक दिन का आप दोनो को..?

50 रूपये तक का बीन लेते है , कभी कभी 100 का काम हो जाता है..,

चलो दीदी , दीदी चलो बच्चा अपनी दीदी का हाथ पकडे उसे खीचने लगा.! शायद वो मुझसे डर रहा था,

हे मुन्ना रुको ज़रा मैं बोला ,

आप खेलते कब हो..?

शाम को कभी कभी और कभी कभी नही खेल पाते..!

मेरे आँसुओ की धार सहसा ही बढ़ गई, उसके जबाब कितने सच्चे थे.!

बच्चा मुझे देख कर शांत हो चूका था बच्ची भी शायद ज्यादा कुछ समझ नही पा रही थी,

बेटा आप रोज बीनते हो..?

हाँ पर जब बुखार हो जाता है तो कभी कभी नही बीनते,

पढ़ेने जाते हो आप दोनों..?

हाँ मैं जाती हूँ  टू क्लास में हूँ बाबू अभी नही जाता ,

मैं अभी भी रो रहा था ,

भईया आप रो क्यों रहे हो..?

कुछ नही बेटा आप इधर आओ..,

मैं ने अपने आँखो को साफ़ किया पर्श से 100 रूपये निकाला और उसे देते हुए बोला ,

बेटा आज से आप इतवार को कुछ भी नही बीनना हर इतवार मैं यही रहूँगा आप मेरे से 100 रूपये ले जाना , आज से हर इतवार आप की छुट्टी , और हर इतवार तुम सुबह – सुबह अपनी किताब ले के आना जितना देर आप कूड़ा बीनते हो उतना देर मैं आप को पढ़ाऊँगा ,

पढ़ो गें आप ..?

वो कुछ नही समझ पा रही थी वो सिर्फ नोट पकडे मुझे देखे जा रही थी , फिर हाँ में सर हिलाते हुए बोली ठीक है,

अब सीधे घर जाओ और आज खूब खेलों आज इतवार है, एक पल में मेरा सारा बचपन मेरे सामने से गुजर गया कैसे हम इतवार को पूरा दिन खेलते रहते थे,

सन्डे मतलब फनडे यही दिनभर बोलते रहते थे,

एक समाजशास्त्र का छात्र होते हुए मेरा दिमाग़ इस तरह की मदद करने से मुझे रोकता है पर आज मैं सिर्फ दिल की सुन रहा था,

आओ गी ना हर इतवार..?

हां भईया..!

उस बच्ची ने आज कूड़े में से मुझें मेरी इंसानियत खोज के दे दी थी , वो इंसानियत जिसे हम रोज़ कूड़े के साथ पालीथीन में बाँध कर रात के अंधेरे में अपने घरों से फ़ेक देते है।

आज इस बात को दो साल हो गए वो बच्ची और इसका भाई आज भी हर इतवार आते है मैं उसे पढ़ता उसके साथ कुछ और बच्चे भी आने लगे है,

आज भी 100 रूपये हर इतवार देता हूँ कभी – कभी वो मना करती है पर आँखे दिखाने पे पैसे रख लेती है

शायद वो बड़ी हो रही है ।

पर आज भी वो पैसे मै उसे ग़रीबी के नाते नही देता वो आज भी मेरी गुरु है ,, उस रोज़ जो सिखाया उसने उसी की फीस उसे देता हूँ , आज भी वो बहुत कुछ सिखाती है..! उसका समपर्ण, उसकी हिम्मत , उसका जीवट वो बहुत कुछ जो आज भी वो मुझे सिखाती है, वो बहुत बड़ी गुरु है ..!

एक अनोखा रिश्ता है हमारा उसे उसका इतवार दे के मैं ने अपना गुरु पा लिया था।

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