आदत से मजबूर!

प्यास लगी है मेरे तनको
पर नदी तक मैं ना जाऊँ
पाऊँ मैं शुभाशीष सबके
पर तनिक न झुकना चाहूँ
खड़े रहे लोग झोली फैलाये
समक्ष मेरे पर मैं कृपणता दिखलाऊँ
न दौडूं मैं, न करूँ परिश्रम
सब कुछ औरों से करवाऊँ
प्रेम पत्र मेरे लिए गाए सारे पंछी
उत्तर मैं अपनी मूर्ति से लिखवाऊं
साहसकी प्रशंसा न करूँ
सबको हीन मैं बतलाऊँ
जो न चले समय मेरे अधीन
तो पिऊँ मैं क्रोधका धतूर
पेड़ तो नहीं हूँ- फिर भी ठहर जाऊँ
मैं अपनी आदतसे मजबूर!

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