आधुनिक वर्ण व्यवस्था

प्राचीन काल  में समाज को उचित ढंग से चलाने और कार्यों को बांटने के लिए वर्ण व्यवस्था का निर्माण किया गया । इस वर्ण व्यवस्था का उद्भव धर्म सूत्रों और धर्म शास्त्रों तथा वेदों, पुराणों ,मनु स्मृति  आदि में पाया जाता है और इन्हीं वेदों पुराणों में इस व्यवस्था की बात कही गई है।

समाज में वर्ण व्यवस्था भी चार वर्णों में विभाजित हुई थी।

*ब्राह्मण

*क्षत्रिय

*वैश्य

*शूद्र

        धर्म सूत्रों और धर्म शास्त्रों के अनुसार चारों वर्णों के लिए आदर्श जीविका के नियम बनाए गए।

*ब्राह्मण :–   अध्ययन करना ,वेदों की शिक्षा, यज्ञ करना और करवाना ,दान देना और दान लेना आदि।

*क्षत्रिय:–   शासन करना, युद्ध करना, लोगों को सुरक्षा प्रदान करना ,न्याय करना, वेद पढ़ना, यज्ञ करवाना, दान दक्षिणा देना आदि।

*वैश्य:–    कृषि पशुपालन गो पालन व्यापार वेद पढ़ना यज्ञ करवाना दान देना आदि।

*शूद्र:–     तीनों वर्णों की सेवा ।

         इस व्यवस्था के माध्यम से समाज को सुव्यवस्थित करने का कार्य शुरू किया गया। इस व्यवस्था में वर्णों को “योग्यता “के आधार पर निर्मित किया गया था। परंतु जैसे-जैसे ब्राह्मण तथा अन्य दो वर्णों की प्रधानता बढ़ने लगी वैसे वैसे इन उच्च तीनों वर्णों ने मिलकर  शूद्रों का शोषण किया । क्योंकि इन्हें सेवा का कार्य सौंपा गया इस सेवा के कार्य को उच्च वर्णों ने  दासत्व समझा और इस दासत्व को बनाए रखने के लिए उच्च वर्णों ने इस वर्ण व्यवस्था को योग्यता से हटाकर जन्म आधारित व्यवस्था कर दिया।

  वर्ण व्यवस्था के जन्म आधारित होने के कारण इसकी विशेषता यह हुई कि व्यक्ति के गुणों की पहचान उसकी योग्यता से नहीं बल्कि उसके जन्म से पहचानी जाने लगी। जैसे एक राजा का पुत्र योग्य  हो या न हो परंतु राजा की मृत्यु के बाद अगला राजा तो उसका पुत्र ही बनेगा। अन्य किसी और वर्ण का योग्य व्यक्ति उस पद के लिए आवेदन नहीं कर सकता। 

                              हालांकि इतिहास में कई बार “योग्यता” और “युद्ध” के माध्यम से इस व्यवस्था को अस्वीकार भी किया गया परंतु मूल रूप से तो यह व्यवस्था प्राचीन काल से चली आ रही है।चाहे आज भारत स्वतंत्र हो गया हो भारत में राजा रजवाड़ों का अंत हो गया हो भारत अपना एक स्वतंत्र संविधान लिख चुका हो चाहे तकनीकी के क्षेत्र में अपार सफलता प्राप्त कर ली हो चाहे प्राचीन भारतीय समाज में और आधुनिक भारतीय समाज में जमीन और आसमान का फर्क आ गया हो पर आज भी आधुनिक भारत के ज्यादातर हिस्से में इस वर्ण व्यवस्था का असर देखने को मिलता है ऐसा नहीं है कि इस व्यवस्था का विरोध नहीं किया गया।

             समाज में इस व्यवस्था का विरोध काफी बार किया गया अलग-अलग वर्णों द्वारा और ज्यादातर शोषित वर्णन द्वारा इसका भरपूर विरोध किया गया। इन विरोधों के फल स्वरुप भारतीय संविधान में अलग से अधिकार दिए गए हैं। स्वतंत्रता, समानता ,और बंधुत्व का और समाज में इसका असर भी देखा गया ।

                        परंतु जो व्यवस्था लोगों की सोच में और नसों में दौड़ रही हो उस व्यवस्था को एकदम से हटाया नहीं जा सकता। इस व्यवस्था को समाप्त करने के लिए लोगों को  दूसरी व्यवस्था से अवगत कराना होगा। इस बात को समझने के लिए हम एक उदाहरण का सहारा ले सकते हैं।” जिस प्रकार एक व्यक्ति को किसी बात को भूलने के लिए किसी दूसरी बात में व्यस्त होना आवश्यक है उसी प्रकार अगर हमें समाज में प्रचलित इस वर्ण व्यवस्था का अंत करना है तो हमें इसके स्थान पर एक दूसरी व्यवस्था को स्थानांतरित करना होगा”

                                                इस वर्ण व्यवस्था का अंत करने के बस दो ही तरीके हैं

(¡) पहला तरीका है :– कोई वर्ण व्यवस्था नहीं सभी लोग समान हैं।

(¡¡)  दूसरा तरीका है :– आधुनिक वर्ण व्यवस्था

                       यह वह व्यवस्था है जो वर्ण व्यवस्था का स्थान लेकर उसे समाज से बाहर कर सकती है।

आधुनिक वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत सभी वर्ग के व्यक्तियों को यह अधिकार है कि वह अपनी योग्यता के आधार पर अपने वर्ण को बदल सकता है कोई शूद्र वर्ण का व्यक्ति अगर अपनी रूचि के अनुसार किसी भी वर्णन की योग्यता प्राप्त कर लेता है तो वह अपने वर्ण को त्याग कर दूसरे वर्ण  को अपना सकता है।

जैसे:– शुद्र वर्ण का व्यक्ति अन्य तीन वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, वर्णों में से किसी भी वर्ण का शिक्षण प्राप्त करके  अपने वर्ण का त्याग कर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र, में से किसी भी वर्ण को प्राप्त कर सकता है।

इस व्यवस्था को “योग्यता आधारित वर्ण व्यवस्था” भी कहते हैं।

                       इस व्यवस्था के आधार पर हम समाज में विद्यमान जाति व्यवस्था को पूरी तरह से नष्ट कर सकते हैं।आज भी भारतीय समाज में रोटी–बेटी का संबंध अपनी जाति में ही किया जाता है कोई  कितनी भी कोशिश कर ले पर यह रोटी–बेटी का संबंध सर्व सहमति के साथ अलग-अलग जातियों में तथा वर्णों में नहीं हो सकता।

                     इस मानसिकता को बदलने के लिए सर्वप्रथम समाज के लिए योग्यता आधारित वर्ण व्यवस्था की शुरुआत करनी होगी।

                   जिस प्रकार वर्ण व्यवस्था में आदर्श जीविका स्थापित की गई थी उसी प्रकार इस योग्यता आधारित वर्ण व्यवस्था में भी आदर्श जीविका स्थापित की गई है।

आधुनिक वर्ण व्यवस्था (योग्यता आधारित वर्ण व्यवस्था) को भी चार वर्णों में विभाजित किया गया है।

★ब्राह्मण

★क्षत्रिय 

★वैश्य

★शुद्र

                    इस व्यवस्था में सभी वर्ण समान स्थान प्राप्त करते हैं कोई भी वर्ण किसी भी वर्ण से ऊंचा या नीचा नहीं है। सभी सभी वर्णों का अपने अपने स्थान पर बराबर का महत्व है इस व्यवस्था में वर्णों को बराबर के  कार्यों में बांट दिया गया है। 

ब्राह्मण वर्ण के कार्य:–

इस वर्ण के अंतर्गत समाज को शिक्षित करने के कार्यों को लिया गया है जैसे:–

अध्यापक.   वह चाहे किसी भी स्कूल, कॉलेज, ट्यूशन, इंस्टिट्यूट, का हो वह इस वर्ण में आएगा। 

                    इस वर्ण में वह सारे अध्यापक /गुरु आएंगे जो किसी भी अपने छात्र/शिष्य को कुछ न कुछ सिखाते हो जैसे– संगीत सिखाने वाला, खेल सिखाने वाला, हाथ का हुनर सिखाने वाला, कुछ भी ऐसा कार्य जिसे सीखने से किसी भी व्यक्ति का भला होता हो उसकी आजीविका चलती हो वह शिक्षित होता हो या वह कुछ नया सीखता हो वह अध्यापन के कार्य में आता है और वह शिक्षक ही ब्राह्मण वर्ण में आएगा। 

क्षत्रिय वर्ण के कार्य :– 

इस वर्ण के अंतर्गत समाज की रक्षा और उसमें न्याय व्यवस्था को सही तरीके से व्यवस्थित करने के कार्यों को लिया जाएगा।

इस वर्ण में समाज की रक्षा जैसे सेना में भर्ती हुए व्यक्ति और समाज में कार्य व्यवस्था आदि को व्यवस्थित रूप से संचालित करने वाले पुलिस कर्मचारी आदि।

              इस वर्ण में समाज में न्याय व्यवस्था को भी सुचारू रूप से संचालित करने वाले व्यक्ति आएंगे। 

इसमें वे पद जो न्याय व्यवस्था में  सम्माननीय हैं जैसे न्यायाधीश एवं उच्च न्यायाधीश आदि।

वैश्य वर्ण के कार्य :–

इस वर्ण के अंतर्गत  जो व्यक्ति व्यापार से संबंधित कार्य करते होंगे।

इसके अंतर्गत कृषि ,औद्योगिक क्षेत्र तथा सभी प्रकार के व्यापार से संबंधित कार्य होंगे।

 इस व्यवस्था के अंतर्गत दीर्घ, लघु, तथा अति लघु व्यापार से संबंधित कार्य होंगे वह सभी लोग इस वर्ण के अंतर्गत होंगे।

शूद्र वर्ण के कार्य :–

इस वर्ण के अंतर्गत वे व्यक्ति आएंगे जो व्यक्ति लोक प्रशासन, स्थानीय प्रशासन ,गैर सरकारी संगठन ,तथा प्रशासनिक अधिकारी ,प्राइवेट सेक्टर से संबंधित कार्य करने वाले लोग, इन संस्थाओं में सहायक कार्य करने वाले व्यक्ति वर्ण के अंतर्गत होंगे।

इस योग्यता आधारित वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें जो व्यक्ति किसी वर्ण विशेष का होगा उसका पुत्र बिना किसी श्रम के उस वर्ण की योग्यता प्राप्त नहीं कर सकता।

              अर्थात जैसे एक ब्राह्मण वर्ण के व्यक्ति का पुत्र ब्राह्मण नहीं हो सकता वह अपनी योग्यता के अनुरूप तथा शिक्षण के अनुरूप किसी और वर्ण का भी हो सकता है। एक ब्राह्मण का पुत्र क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र भी हो सकता है यह केवल उसकी योग्यता पर ही निर्भर करता है।

               इस योग्यता आधारित वर्ण व्यवस्था मैं अगर कोई व्यक्ति अपने पद को छोड़ देता है या उसका कार्यकाल पूर्ण हो जाता है तो वह किसी वर्ण का व्यक्ति नहीं रहता वह केवल एक आम नागरिक की श्रेणी में आता है। 

                 इस आधुनिक वर्ण व्यवस्था में कोई भी व्यक्ति स्थाई रूप से नहीं रह सकता कोई भी व्यक्ति इस व्यवस्था के अंतर्गत तभी तक आता है जब तक वह इस व्यवस्था में कार्यरत है यह व्यवस्था अस्थाई व्यवस्था है।

                  इस आधुनिक वर्ण व्यवस्था (योग्यता आधारित वर्ण व्यवस्था) के लागू होने से समाज में ऊंच नीच था तथा भेदभाव  खत्म करने में काफी हद तक सहायता मिलेगी।

                    यह व्यवस्था समाज के उस तबके के लिए भी अपनी योग्यता साबित करने का मौका है जिस तबके को समाज के उच्च वर्णों ने हमेशा नीचा दिखाया और उनका शोषण किया।

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