इंसानों के भेष में इंसान बनाते हैं

चलो फिर से एक नया संसार बनाते हैं
इंसानों के भेष में इंसान बनाते हैं
ना मैं ऊपर ना तुम नीचे
जहां सब साथ खड़े हों वो पायदान बनाते हैं
इंसानों के भेष में इंसान बनाते हैं

हर तरफ क्रूरता का बोलबाला
कोई किसी को ना समझने वाला
अतिवाद ग्रसित है हर एक मानव
लहू पीने को आतुर जैसे हो एक दानव
चलो न प्रेमजनित एक परिवार बनाते हैं
इंसानों के भेष में इंसान बनाते हैं

जाति धर्म के नाम पे हर दिन
लहू पति का बहता है
माँ की गोद है सूनी होती
भाई हर पल डरता है
चलो न जिसे सब मिलकर पूजें ऐसा भगवान बनाते हैं
इंसानों के भेष में इंसान बनाते हैं

स्वार्थ निहित है जयचंदों का
इस कूटनीति के मेल में
तुम भी हारोगे मैं भी हारूँगा
घृणा भरे इस खेल में
प्रेम के भाषा समझे जो
ऐसा राम-उर्-रहमान बनाते हैं
इंसानों के भेष में इंसान बनाते हैं

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