औरत एक नूर

अगर नजाकत देखी है उसकी,
तो जरा उसकी ताकत आजमा लेना।
मासूमियत सुहाती है उसकी,
तो जरा क्षत्राणी सा स्वरूप जो उसने हर बुराई के लिए धरा उसे अपने अंदर समा लेना।
किरदार उसके कई हैं पर उसे संसार का नज़मा बना लेना।
नगमा है वह तुम्हारी जिंदगी का,
कहीं तुम्हारे बनाए बवंडर के गीत तुम्ही को न ढहा दें।
अरे नारी से नर बनता है, उसको सताना; ज़फा़ ये नारायण के खिलाफ है ;कितनी बार चिल्लाकर बताएंगे?
उल्फत है वो,
नूर बेहद खूबसूरत है वो,
नूर को तो सहेज कर रखते हैं ना;
फिर लक्ष्मी को क्यों नहीं?
हसरत रखते हैं लक्ष्मी हर घर बिराजे;
पर पता नहीं क्यों एक घर में पराया धन मानते हैं दूसरे घर में पराया खून,
है सिर्फ हवस का जुनून ।
हाँ मैं अपनों में अपना वजूद ढूंढ रही हूँ,
पर अस्तित्व संसार के लिए अलग बना कर खड़ी हूँ।
हर रहा नर मुझे; लड़ना तो पड़ेगा,
चिराग तले मेरी जिंदगी के अंधेरे को मिटाना तो पड़ेगा।
अभी तक झूठे वादे मिले हैं,नापाक इरादे झेले हैं,
माना सहनशक्ति की मूरत हूँ, पर किसने कह दिया मैं जुर्म सहने वाली सूरत हूँ।
नदिया का नीर निस्वार्थ ही सागर में समा जाता है ,
औरत खुद में एक वात्सल्य का समंदर है जिसकी विशुद्धता में डूबा जा सकता है,
उसके दामन को थाम कर ममता के उस आंचल को पाया जा सकता है।
तू उसे पतवार बनाकर अपनी कश्ती पार लगा सकता है।।

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