औरत

क्या कभी सोचा है किसी ने
एक औरत खुद को सजाती है
घर आंगन को महकाती है
परिवार की खुशियों को अपना बनाती हैं,

ज्वर में जलती है फिर भी मुस्कुराती है
तकलीफों से अकेली जूझती रहती है
सिकन माथे की फिर भी छुपा लेती है
वो ऐसा कैसे कर लेती है??

तूफान सी पल में इधर तो कभी उधर
सबकी मांगें पूरी करते करते
खुद की चाहत भी भूल जाती है
सच में! वो ऐसा कैसे कर लेती है??

इक पल में हम कह देते हैं
तुमने आज तक किया ही क्या है
वो सिसकियां लेती है पर फिर भी
आपने कुछ खाया ये सवाल करती है,

पति, फिर बच्चों से वहीं ताने सुनती है
चुप रहती है पर ख्याल सबका रखती है
जब दुनिया छोड़कर एक दिन चली जाती है
जिम्मेदारियों का बोझ तब हमपर गिरता है,

मन में सबके बस एक ही सवाल रहता है
“वो ऐसा कैसे कर लेती थी”
“वो ऐसा कैसे कर लेती थी”………

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