कविताएँ

कविताएँ माँ जैसी होती हैं,
हर रोज़ शाम ढले
किसी खूबसूरत शकल में आती हैं,
पर रात जब अकेले तनहा से हों,
कोई प्याली चाय के साथ दिन भर के सवाल करती हैं,
कभी मन में चल रहे उधेड़बुन को
बात हीं बात में निकाल देती है,
तो कभी मीठी लोरियों की तरह
एक अलग दुनिया में ले चलती हैं…

कविताएँ माँ जैसी होती हैं,
सबसे सरल सबसे भावनात्मक।।

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