क़तरा क़तरा ज़िन्दगी

मालूम होता है आँख से निकला हर एक क़तरा ज़िंदगी से चुन-चुन कर रंग चुराता जा रहा है…एक मोहब्बत है जो सिसक-सिसक कर अंदर ही अंदर दम तोड़ रही है। दिमाग सोचने मे दिन और रात का फर्क़ नहीं करता अब। ग़म बेरंग और स्याह आँखों से बाहर झाँक कर देखता है..और खुशी अधखुले होठों के बीच दबी सी रह जाती है। दिल जाने अनजाने एक चुभन से भरी तन्हाई में खोता जा रहा है,,,,एक खामोशी की इल्तज़ा है, एक बेनाम सी खामोशी।
ज़िंदगी मे कुछ नये रंग भरने को आँख फिर से एक सफर पर निकलेंगी। दिल फिर से धड़कने के लिए कोई नया साज ढूंढता दिखायी देगा। अल्फाज़ फिर किसी की तारीफ में नगमे सुनाएँगे..कभी हँसाएंगे, तो कभी और हँसाएंगे। ऐू ज़िन्दगी हम फिर से बन संवर कर आएँगे।
अमरीश सैनी

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