काली परछाई

कल का रंग, जब गहरा हो
तब आज दूषित हो जाता है
उस विषैली कल की परछाई से
जल कर आज भस्म हो जाता है।

पूछो उस बेजान सुकूमारी से
बचपन जिसका कलुषित हो
क्या उस काली परछाई से
वो आज भी निकल पाई है।

शर्म, हया और लज्जा से
क्या वह ये अधर्म किसी को
अपने मुख से बतला पाएगी
हां अंदर ही अंदर घुटती जाएगी।

माना जो कभी लज्जा तोड़कर
अपना दुःख कह भी दिया
तो क्या ये बनावटी समाज हमारा
उसको गलत ना ठहराएगा?

वो घुटन , वो चोट आत्मा की
क्या आज मिट पाएगी
वो पुराना घिनौना चेहरा
क्या कभी भुला पाएगी।

क्या कभी कल की परछाई को
आज से जुदा कर पाएगी
पूछो ऐसी दुर्गा स्वरूपा से
क्या उनकी पूजा की जाएगी।

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