‘काल्पनिकता’

किसी दिन मीरा अपने हॉस्टल से घर वापिस आ रही थी,
तभी बस में बैठे हुए उसे एक आवाज़ आई, “ दीदी
कुछ दो भूख लगी है “
पर मीरा के खुद के पास केवल 250 रुपये थे, जो केवल उसे
घर तक पहुंचा सकते थे,
मीरा तभी उदासी भरी मुस्कान से उसकी तरफ देखते हुए कहने लगी,
“ मेरे पास कुछ……….” मीरा उसके चेहरे की मासूमियत को देखकर
अपने यह शबद् भी पूरे नहीं कर पायी।
मीरा ने सिर्फ उसका नाम पूछा, तो उसने धीमी सी आवाज़ में कहा,
सीरत, जो कि उसके चेहरे की मासूमियत, भोलेपन से पूरा मिलाप कर रहा था,
तभी मीरा को याद आया कि उसकी सहेली राधिका ने उसे चॉकलेट दी थी
जिसका सिर्फ अब ¼ ही बचा था।
उसने वह जल्दी से अपने बैग से निकाली और उसे दे दी,
इससे उसकी भूख तो नहीं मिट सकती थी
और तभी सीरत निराश मन से वहाँ से चली गयी।

घर पहुँचने के बाद मीरा ने इस दृश्य को अपनी कल्पनिकता
से जोड़ कर अपनी डायरी में लिखा और इस बार उसने उसे 5 चॉकलेट दी
जिससे सीरत का पेट भरने के साथ साथ उसके चेहरे पर जो मुस्कान थी,
वह किसी द्विज से कम नहीं थी।

मीरा की इस कल्पनिकता से मीरा को अनुभूति ही नहीं हुई कि
सीरत की वो मुस्कान सिर्फ कल्पनिक है।

कुछ क्षण बाद उस मुस्कान का आनंद लेने के बाद मीरा के मन में
ख्याल आया कि इस सृष्टि में क्या कुछ कल्पनिक होगा।

जिस तरह से वह मुस्कान कल्पना थी,
हो सकता है यह सृष्टि भी किसी भी किसी की कल्पना ही हो,
हम सब भी किसी की कल्पना ही हो

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