क्वारंटाइन

बंद कमरे में कितने शब्द निकाबाहर होती हर एक हलचल को अवॉयड करती हूँ,
तो कभी मन को मार कर आँख सेक लेती हूँ।

चिड़ियों की चहचहाट आती है तो हेडफोन्स लगा लेती हूँ,
और खिड़की से नज़र जाए तो परदे गिरा देती हूँ।

हज़ारों ख्यालों के बीच सोती हूँ,
और उठती एक सवाल के साथ हूँ –
क्या सब ठीक हो गया?
जी चाहता है सब बदल डालूं।

ये सात दिन तो सात महीने जैसे निकले हैं,
और गहरी नींद तो सात मिनट भी न मिलें हैं।

जब भाग रही थी ज़िन्दगी से तो वेकेशन चाहिए था,
और आज पूरी दुनिया स्टेकशन में है।

Leave a Reply

Your email address will not be published.