ख़ाब अधूरा

ये ख़ाब अधूरा है 

आँखे बंद है 

फिर क्यों होता न पूरा है?

नींद की गहराई है गुम कहीं 

नैनो से वो खो सी गई 

सपना भी देखा उजाले में 

रात बीत गई उभरते सवालों में ।

ये ख़ाब अधूरा है 

कितनी कड़ियाँ जोड़ ली 

फिर क्यों होता न पूरा है?

थमा है कहीं, 

राह से भटका है कहीं 

जवाबों में उलझा है कहीं 

चमकते सितारों में, जमीन से बिछड़ा है कहीं ।

ये ख़ाब दूसरा है 

सवाल भी बदल गया 

फिर क्यों होता न पूरा है?

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