घर अच्छा लगता है जब

उसके जगमें पूर्वजोंका आधार हो
चारों दिशा में रीतियों की खुश्बूकी बहार हो
उसके रशोयी घरमें ममत्वका श्रृंगार हो
द्वारपे आये हर आगंतुकके मनमें सत्कार हो!
उसके दिवारों में पिताके श्रमका आहार हो
छतके साये में जन्मा हर स्वप्नका आभार हो!
उसके आंगन में भाइ-बेहेनों का प्यार हो
सम्पूर्ण क्षेत्र में गूंजती खीलोनों की किलकार हो!
उसके कक्षोंकी आवाजोंके संग बहता मंझधार हो
हर संध्या समारोह लगता जैसे एक त्योहार हो!
उसके स्तम्भों में इकदूजेका सम्बल स्वीकार हो
तनसे व न मनसे कोई कभी बीमार हो !
उसके रंग में एकताका दीदार हो
भितरकी विविध कलाकारी पर सबको एतबार हो!
उसके पूजाघर में भावुकताका आचार हो
सततः कर्मठ रहके ध्ययेका अक्षरशः जानकर हो!
उसके नलोंमें बहता स्वच्छ जलधार हो
दूषित कणकणका नालों से परिहार हो!
उसके कोनों में संलिप्त समस्त बलका सार हो
हरेक अनुयायी उसका, वो परवरदिगार हो!

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