ढृणता की जीत

11 सितम्बर 2001, न्यू यॉर्क  में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुऐ धमाके ने अमेरिका को ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया था। इस धमाके की गूँज भारत में भी सुनाई पड़ रही थी।  

मनीष गुप्ता, २५ साल का युवा जिसने अभी अभी सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग पास की थी, बड़ी उम्मीदों के साथ नौकरी ढूढ़ने बेंगलुरु  आ तो गया था, पर नौकरी अब बची कहाँ थी भाई? मध्यवर्गीय क्लास से आया यह युवा नहीं जानता था की इसके साथ आगे क्या घटित होने वाला है।  ये तो बस रंग बिरंगे सपने बुन भोपाल से अपने माता पिता से विदाई ले सिलिकॉन वैली आ गया था।  जेब में ५००० रुपये थे. कुछ लड़कों के साथ मिलकर एक कमरा किराये पर लिया जहाँ उसे १५०० रूपए किराया लगना था । खाने पीने का कोई ठिकाना नहीं, सुबह जब साहब अपनी डिग्री की फाइल लेकर नौकरी ढूंढने निकलते तो वापसी का कोई ठिकाना नहीं रहता।  

मनीष को बेंगलुरु  आये अब ४ महीने बीत गए थे. नौकरी की तलाश में जूते घिस गए थे पर नौकरी का कुछ भी अता पता नहीं था।  ५००० रुपये भी बेचारे कब तक इन साहब का साथ निभाते।  जैसे तैसे कभी चना कभी मूंगफली खाकर दिन रात गुज़ारे।  पर अब वो सहारा भी जाता हुआ नज़र आ रहा था।  हताश मनीष को रिटायर्ड पिताजी ने २ महीने का समय और देकर घर वापस लौटने का फरमान जारी किया, साथ ही ४ ००० रुपये का मनी आर्डर भी किया।  

बचपन से सरकारी स्कूल में पढ़े मनीष को ज़िन्दगी ने मज़बूत तो बना दिया था, और बची खुची कसर अब यह  ९/११ का बम धमाका निकाल  रहा था. पर मनीष ने भी किस्मत से पंगे लेने की ठान रखी थी।  आखिर वो दिन भी आ ही गया जब मनीष को एक सॉफ्टवेयर कंपनी, मेगालो सिस्टम्स में नौकरी मिल ही गयी. पर ये कैसी नौकरी थी जहाँ आपको काम तो करना था पर वेतन के नाम पर कुछ भी नहीं ! ऐसी नौकरी तो मनीष ने पहली बार देखी थी।  ९/११ ने ये दिन भी दिखा दिए और सिखला दिया की भैया नौकरी ऐसी भी होती हैं।  यहाँ आपको खाना कंपनी की तरफ से मिलेगा, यही आपका रोज़ का वेतन है।    अब करते भी तो क्या करते। अमेरिका में नौकरी कर रहे लोगों की नौकरियां छूट रही थी और उन्हें भारत वापस भेजा जा रहा था।  भारत में सॉफ्टवेयर कम्पनीज को ऑफ शोर प्रोजेक्ट्स मिलने बंद हो गए।  कई कंपनियां तो इसके चलते ठप्प पड़ गयी थी।  

मनीष एक्टिव सर्वर पेजेस पर काम करने लगा।  साथ ही एडवांस्ड कोर्स की ट्रेनिंग लेने लगा जिसके लिए उसके पिताजी और २ बड़े भाइयों ने उसकी आर्थिक सहायता की. धीरे धीरे दुनिया ९/११ के बम धमाकों की चोट से बाहर आ रही थी और नयी सुबह की शुरुवात हो रही थी।  मनीष को भी अब इस कंपनी में कार्य करते ६ महीने बीत गए थे।  उसने अब दोबारा नौकरी की खोज शुरू की,  एक ऐसी नौकरी जहाँ वेतन रूपए के रूप में मिले. और आखिर वो द्दिन भी आया जब मनीष की ये इच्छा पूरी हुई. कंपनी थी. नेट टेक्नोलॉजी। यहाँ मनीष को ३,५०० रूपए प्रति माह सैलरी पर नौकरी मिली तो सही, पर ५०० रुपये प्रति माह लंच के नाम पर काट लिए जाते थे और ७५ रूपए प्रोफेशनल टैक्स के नाम पर. जेब में आते थे मात्र २,९२५ रूपए।  यहाँ भी अब मनीष को ६ महीने बीत गए थे काम करते हुए।  onsite मैनेजर ने मनीष के कार्य की सराहना करते हुए अप्प्रेसिअशन मेल भेजा, पर उसका कोई नतीजा नहीं निकला।  मनीष अब भी वही खड़ा था. अब तो उसे लगने लगा था की ज़िन्दगी ऐसे ही बीत जाएगी।  

साल २००३ में मनीष ने फिर से नयी नौकरी की खोज शुरू की. बहुत मशक्कत के बाद उसे २ कंपनियों से ऑफर आया।  अब समय था सही चुनाव का।  बहुत सोचने के बाद आखिर मनीष ने Maitree कंपनी को चुना.और जून के  महीने में १५००० रुपये प्रति माह वेतन पर नयी कंपनी ज्वाइन की.  यहाँ मनीष को नया प्रोजेक्ट मिला। उसकी टीम में ५ लोग थे। प्रोजेक्ट काफी  मुश्किल था और ओल्ड टेक्नोलॉजी पर काम करना था.   ये Automobile  testing प्रोजेक्ट था. दूसरा जो चैलेंज था वो ये की टेस्टिंग डाटा को वेब सर्विस से होस्ट को real time में कैसे भेजा जाए । नीती सेल्वेराजन प्रोजेक्ट मैनेजर थी. पूरी टीम जोरो शोरो से काम में लगी हुई थी फिर चाहे रविवार हो या रात। 

मनीष को ये एहसास ही नहीं हुआ की उसका वज़न ५-६ किलो कम हो गया है।  आखिरकार उनकी मेहनत रंग लायी और प्रोजेक्ट सफल हुआ। मनीष को नीती  सेल्वेराजन से, जो की प्रोजेक्ट मैनेजर होने के साथ ही कंपनी की एक फाउंडर मेंबर भी थी, स्पेशल अप्प्रेसिअशन अवार्ड मिला।  साथ ही Maitree की वेबसाइट पर मनीष का नाम भी अंकित किया गया । ३ महीने बाद ही मनीष को कंपनी की तरफ से पहले वाले क्लाइंट के लिए नए प्रोजेक्ट पर काम करने के लिए एरिज़ोना भेजा गया. और मनीष को ये प्रोजेक्ट लीड करने का मौका भी दिया गया. इस नए प्रोजेक्ट के लिए मनीष को बीजिंग भी जाना पड़ा।  ये प्रोजेक्ट था ‘Go Green’. इस प्रोजेक्ट को भी मनीष नै उतने ही उत्साह से खत्म किया और दोबारा अप्प्रेसिअशन अवार्ड पाया। अब मनीष सभी एशियाई देशों के लिए सिंगल पॉइंट ऑफ़ कांटेक्ट बना दिया गया।  

लेकिन मनीष की ज़िन्दगी में मुश्किलों का दौर फिर से आया. कंपनी के वाईस प्रेजिडेंट बालाजी कृष्ण स्वामी ने मनीष का कंपनी में जीना दूभर कर दिया।  यहाँ मनीष के लिए वो स्थिति आ गयी थी की या तो कंपनी छोड़ दो या फिर कुछ कर के दिखाओ। उसने भी हार नहीं मानी और काम में लगा रहा. धीरे धीरे जब क्लाइंट्स से और अप्प्रेसिअशन मेल्स आने लगे तब स्वामी का भी दिल पिघला और कुछ नरमी का रुख किया उसने मनीष की तरफ। साल २०१३ में मनीष को प्रमोशन मिला और वो सीनियर प्रोजेक्ट मैनेजर बन गया। अब वो दिन भी आया जब मनीष की शादी हो गयी और जल्द ही उनकी दुनिया में बेटे के रूप में एक नन्हा मेहमान आया।  अब उसकी पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ भी बढ़ गयीं थी। उसने २००९ में २३ लाख रूपए जमा करके बिना लोन लिए  अपना घर खरीदा। 

साल २०१५ में जब भारत और इंग्लैंड का क्रिकेट मैच हुआ तब मनीष को भी कंपनी की तरफ से मैच देखने का इनविटेशन मिला और उसे तब एक बहुत बड़ा सरप्राईज़ मिला जब उसे कंपनी के CEO के साथ बैठकर मैच देखने का मौका मिला।  मनीष अलग अलग प्रोजेक्ट्स पर काम करता गया और अवार्ड्स पाता गया. उसे Maitree पिलर  अवार्ड, bronze पिलर अवार्ड तथा सिल्वर पिलर अवार्ड जैसे कई पुरस्कार मिले। साल २०२२ में उसे जनरल मैनेजर बना दिया गया जहाँ बैठकर वो अब दूसरो की किस्मत सवार रहा है और अपने जैसे कई युवाओ का प्रेरणास्त्रोत बन रहा है..मनीष चाहता है की कोई भी युवा कठिन परिस्थितियों में हिम्मत न हारे और अपनी मेहनत और लगन पर विश्वास करे। हर रात के अँधेरे के बाद सुबह की आशा की किरण उजाला लाती है। 

Comments

  1. Suchitra khera

    This story is inspired by real story of one of my friends. These are all his struggles which he faced during the 9/11 attack.

  2. Nitin khera

    The story definitely reminds of the 9/11 attacks and the poor scenario in software job sector. Such crisis occurs at every big incident where many people suffer.

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