तृप्ति

धूप की पहली किरण
छू रही मेरे पैरों को।
रूह को करती तृप्त,
जैसे घाटी ऊँचे नहरों को।

खोलकर खिड़की अपने घर की,
नज़र उठा कर देखूं नीला गगन,
बिखरे बादल श्वेत बादल
मैं रंग भरु हो के मगन।

चांदनी रात के किस्से मैं लिखती नहीं,
तारों में मुझे दिलचस्पी नहीं।
अँधेरे से मुझे नहीं दर लगता है,
कलम तो प्रकाश में ही चलता है।

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