नन्हीं गौरैया – प्यारी पुचकू

एक सुबह बालकनी से मीठी आवाज़ आई
जहां रहता था गौरैया का प्यारा परिवार
हमनें झांका बाहर तो चीं चीं का स्वर सुना
आज घोंसले में शायद कोई नया मेहमान आया था।

दो प्यारे नन्हों ने नया आसमान देखा था
नई दुनिया नया घर प्यारे परिवार को पाया था
नन्हें थे पंख उनके पर ख्वाहिशें बड़ी थी
मां उनकी दाना चुगाती चीं चीं करते दाना खाते थे।

एक बिल्ली थी घात लगाए, नज़र गड़ाए
घोंसला ऊपर है बेचारी वहां तक कैसे जाए
बैठे रही इंतज़ार में जो मां उनकी दाना लेने आए
बस उसी समय गला दबोच कर खा जाए।

घर हमारा तो ये अन्याय कैसे होने देते
ये बिल्ली मौसी को खूब भगाया मार लगाया
दानें रखे पानी रखा उनके चीं चीं सुनने को
और नन्होंं की एक झलक को मन आतुर था।

कुछ दिन में प्यारे नन्हें आंगन में फुदकने लगे
एक को पुचकू पुकारा दूसरे को मटरू
दोनों प्यारे पंख फैलाते उड़ने का प्रयास करते
छोटे छोटे पंख उनके अभी तैयार कहां थे।

उनकी मां जैसे फुदक फुदक कर रोज़ सिखाती
ख्वाहिश हो आसमान की तो ऐसे उड़ो
हर रोज़ उनको यही बतलाती उड़ना सिखाती
मटरू था तेज बहुत जल्द ही उड़ने लगा।

पुचकू हमारी थी बेचारी ख्वाहिश लिए आंखों में
फुदक फुदक ही रह जाती डर था उसको गिरने का
हर बार करती कोशिश पर उड़ ना पाती
मां उसकी निराश हो गई पुचकू भी हताश हो गई।

एक दिन पुचकू दाना चुगने नीचे जब आई
बिल्ली मौसी थी घात लगाए नज़र जब हमने घुमाई
देखा पुचकू फुदक रही थी चीं चीं करती जान बचाए
इधर से उधर उड़ रही थी चालक मौसी भी हारी नहीं।

बिल्ली जब पुचकू के करीब आई थोड़ा गुर्राई
पुचकू का डर हुआ छूमंतर और पुचकू ने
पूरी जान लगाई पंख फैलाई और उड़ चली
बड़े आसमान में उड़ती निडर पुचकू ने अपनी जान बचाई।

ख्वाहिश तो सबकी होती है उड़ने की
पर गिरने का डर जंजीर बन जाता है
जिस दिन वो जंजीर तोड़कर खुद को पहचान लो
ऊंची उड़ान का सफर बस वहीं शुरू होती है।

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