नन्हीं जान

अरी ओ परबतिया सुना! आज मालिक क्या कह कर गए हैं। कल उनके बेटे का जन्मदिन है हमें छुट्टी मिली है, चल जल्दी घर कितनी मुश्किल से ये छुट्टी मिली है।

पार्वती और झुमरी दोनों कोयले के खदान में दो साल से काम कर रही है, झुमरी का पति भी यहीं काम करता है। पार्वती का ब्याह सलिल से चार साल पहले हुआ था। दारू शराब की लत ने कुछ ही सालों में सलिल की जान ले ली, सलिल के मरने के एक महीने बाद पता चला कि पार्वती पेट से है। अम्मा बनने जा रही है, अकेली अम्मा उसे अपने बच्चे की चिंता होने लगी , दिन रात सोचती की उसका घर कैसे चलेगा।

कुछ महीने घर का काम कर कर के जैसे तैसे पार्वती ने गुजारा किया, पर सोमूआ के पैदा होते ही उसकी जिम्मेदारियां बढ़ गई। अब वो बड़े काम की तालाश करने लगी, उसी राह पर इसे झुमरी मिली।

झुमरी के कहने पर खदान के मालिक ने पार्वती को काम पर रख लिया। सोमू बहुत छोटा था और पार्वती अकेली, इसीलिए पार्वती काम पर सोमू को साथ लेकर जाने लगी।

पीठ पर सोमू को बांधे सारा दिन काम करती, जब वक्त मिलता सोमू को दूध पिलाती और ममत्व लुटाती।
आज पार्वती को खदान में काम करते करते दो साल हो गए हैं, तब से आज तक उसने कोई छुट्टी नहीं ली और ना ही यहां कोई छुट्टी मिलती हैं मजदूरों को, जब तक वो बीमार नहीं पड़ते।

पार्वती खदान से सोमू को बांधे साड़ी से पसीना पोछ्ते हुए कहती है, ” हां झुमरी दीदी साल में ये एक दिन की छुट्टी ही तो मिलती है”।

हांथ मुंह धोकर दोनों बाहर निकलती है। तभी पार्वती कहती है, झुमरी दीदी मुझे कुछ पैसे दिलवा देती, आज कल सोमूआ की तबियत ठीक नहीं रहती, दवाइयों का खर्चा अलग से बोझ बन गया है। समझ नहीं आता दो वक्त की रोटी को जहां पूरा दिन मरते हैं, वहां दवाइयां कहां से खरीद कर खिलाऊ। आज कल हाथ थोड़ा तंग है झुमरी दीदी।

झुमरी कहती है, ” सच कहती है तू परबतिया, चल बात करती हूं माकिल से” कहते हुए पार्वती और झुमरी दोनों ही खदान के मालिक रहमान भाई के पास जाती है।

रहमान भाई, ” क्या री झुमरी घर नही गई अब तलक, कौनो बात है का”।

झुमरी कहती है, ” हां मालिक एक विनती है, मालिक हमके कुछ न चाही, जेतना मिल जात है पेट भरे भर का  होवत है, मालिक इ परबतिया को थोड़ा पैसा एडवांस चाहिए था, इका बिटवा बीमार चल रहा है, दवाई का खर्चा ज्यादा है तो थोड़ा परेशान रहती है”।

रहमान भाई ऊपर से नीचे तक एक दो बार आँखें फाड़ फाड़ कर पार्वती को दांत खोदते हुए देखते है, फिर थूकते हुए कहते है,” का रे तुमका पैसा चाही”।

पार्वती लजाती हुई सिर पर पल्लू चढ़ा कर एक कोर साड़ी का मुंह में दबाए कहती है, ” हा मालिक मिल जात कुछ रकम तो, मदद हो जात कुछ दिन से सोमूआ बहुत बीमार रहत है , बिटवा के सहारे दिन गिनत हैं मालिक, एका किछु होई गवा तो……” कहकर रोने लगती है।

रहमान भाई, ” अरे अरे चुप होई जा, ओ झुमरी पकड़ ईका संभाल जरा”।

रहमान भाई बड़े दरियादिल इंसान थे, गरीबों से काम भी लेते थे, उनकी वक्त वक्त पर मदद भी कर दिया करते थे। रहमान भाई जीतना देते उसका दुगना काम करवा के वसूल लेते थे।

उन्होंने ने कुछ पैसे पार्वती के हांथ पर रख दिए। उसने जल्दी से रुपिया को साड़ी के पल्लू में बांध लिया और दोनों वहां से चल पड़ी।

पार्वती घर पहुंचती हैं, सोमू को बिस्तर पर लिटा कर पानी लेने जाती है। बस्ती में पानी समय पर ही मिलता है, ना गए तो पूरा दिन पानी नही मिलता। पार्वती पानी भरती है तभी उसे  सांता काकी मिल जाती है तो उनसे पूछती है, ” अरी ओ काकी पांव का दर्द कैसा है अब, पतोहु से सेवा काहे नहीं करवाती हो।”

( सांता काकी बस्ती की सबसे बुजुर्ग और चालाक महिला है, कोई अनुष्ठान हो,पूजा हो, पाठ हो सबकी विधि सांता काकी ही जानती हैं।
70 साल की है अपनी काकी पर शारीरिक बल और बनावट 55 सा है। रंग थोड़ा साफ़ है, आंखों पे चश्मा है और हमेशा सूती साड़ी ही पहनती हैं , वो भी सीधी पल्ला। आवाज़ बुलंद बस अपनी बहू नहीं संभलती काकी से।)

काकी बड़ी मूड में कहती हैं, ” ओ डायन का नाम मत ले पार्वती कह देत है, नरक में जाए तो सुकून मिले”।

पार्वती कहती है, ” ऐसे न कहो काकी, जैसी भी है बहू है, अभी मरने को आओ तो कौन पूछेगा , बहू ही सेवेगी ना, कोई और है जो आएगा, हमही को देख लो जबसे सोमुआ के पापा गए हैं, कोई सुध नहीं लेता हमारी, अकेले ही गुजर बसर कर रहे हैं। ऊपर से आज कल बिटवा भी बीमार रहता है, का करें काकी कुछ समझ नहीं आता है।”

काकी अपना दर्द भूल कर पार्वती से कहती हैं,” अरे का हुआ अपने सोमूआ को, वैद से ना देखवाती हो, गांव के पश्चिम छोर, दूसरा टोला  में ना बिटिया एक पीर बाबा रहते हैं, बड़े साधक है, सुना है नाड़ी पकड़ कर बीमारी बता देत है, कई लोग ठीक हो गए, एक बार अपने सौमुआ को क्यों नहीं दिखवाती हो।”

पार्वती – ठीक है काकी, अभी चलते हैं पानी लेने आए थे बड़ी देर हो गई अभी तक तो सोमुआ उठ के रो रहा होगा। अपना ध्यान रखना काकी हम जाते हैं।

पार्वती पानी ले कर घर पहुंचती है और सोमू को दूध पिलाती है, प्यार से उसके माथे को सहलाती है, रह रह कर पुचकारती है। सोमू भी कभी चिल्लाता कभी शांत हो कर दूध पीता।

अचानक सोमू के रोने की आवाज बदल जाती है, सोमू बहुत ज़ोर ज़ोर से चीखने लगता है, पार्वती एक दम से घबरा गई और दूध पिलाना छोड़ उसे गोदी में खेलाने लगी। उसे पुचकारती उसका नाम पुकारती, पर बार बार वह उतना ही ज़ोर ज़ोर से चींखता। पार्वती का कलेजा मुंह को आता, जब सोमू कराहता। पार्वती को कुछ समझ नहीं आ रहा था, वह सोमुआ को लेकर दौड़ी दौड़ी वैद जी के पास गई, वैद जी ने नाड़ी देखी और कहा घर ले जाओ।

अब सोमुआ चुप हो चुका था, पार्वती को दौड़ा देख काकी भी पीछे पीछे आई। पार्वती सुन्न पड़ गई थी, खुली आँखें, शरीर ठंडा, आंखों के आंसू जो चेहरे पर सुख गए थे, सूखे होंठ जिनपर सिसकियां भी नहीं थी। बेजान पार्वती सोमुआ को गोदी में लिए वैसे ही खड़ी थी।
वैद जी ने दो तीन बार समझाते हुए कहा, ” ईश्वर की यही इच्छा होगी बिटिया अब घर लौट जा”।

पर पार्वती तो ऐसे शून्य में चली गई थी, जहां सोमुआ को बड़ा होते हुए देख रही थी। जहां दोनों खुशी खुशी एक साथ बिना किसी गम के जी रहे थे। उस मां की हालत भला कौन समझ सकता है, जिसकी ममता अधूरी थी, उसके स्तनों का दूध भी अभी सुखा न था, अपने दूध मुहे बच्चे को तड़प तड़प कर देखने वाली मां को कोई क्या समझाए।

काकी सब जानते हुए भी पार्वती के पास चुप चाप खड़ी थी, उसके सामने काकी क्या कहे जिसका सब कुछ खत्म हो गया हो। पार्वती का जीवन बस सोमू पर आश्रित था, उसके बिना पार्वती एक पल भी ना रह पाती थी।

काकी मौन रह कर देख रही थी, कुछ देर बाद पार्वती की नज़र काकी पर पड़ी, अचानक पार्वती रोने लगी और काकी के पांव पर गिर कर कहने लगी, “चलो न काकी ले चलो किसी हकीम, बाबा या वैद के पास मेरा सोमुआ ठीक है बस बीमारी है, चलो न काकी बुत बन कर क्यों खड़ी हो।”

काकी का कलेजा फट गया और काकी भी दहाड़े मार कर रोने लगी।
पार्वती के आंसू पोंछ कर समझाने लगी, ” चुप हो जा पार्वती चुप हो जा बिटिया, जो होना था हो गया” इतना कह कर काकी भी रोने लगी।

ये मंजर देख कर किसका कलेजा नहीं फटता, धीरे धीरे बस्ती में सबको पता चला, झुमरी, बिंदियां, सुजाता और सब बस्ती के लोग इकट्ठा हुए। सबने पार्वती को हिम्मत दी और फिर क्रिया कर्म की तैयारी की बात हुई।

पार्वती ने उसी हालत में अपने पल्लू में बंधे पैसे निकाले और झुमरी को दिया। ” झुमरी दीदी ये ले रुपिया, लिया तो था इलाज के लिए पर अब यहीं सही”, कह कर पार्वती रोने लगती है।

बाकी के पैसे सबने मिलकर जुटा लिया और सोमूआ का अंतिम संस्कार हुआ। पार्वती भी चुप चाप अपने झोपड़ी में जाती है, लेट कर कुछ देर छप्पर निहारती तो कभी रोने लगती, फिर करवट बदल कर सो जाती, उसे बार बार ऐसा लगता जैसे सोमूआ बुला रहा है। दूध पीने के लिए अपनी मां को पुकार रहा हो। एकाएक पार्वती उठती है और दियाराखे पर रखी पोटली से ज़हर खा कर सो जाती है। अब पार्वती किसके लिए जिंदा रहती भला तड़पकर जीने से, उसे मरना आसान लगा, एक तो उसका सहारा चला गया जिसके लिए दिन रात मेहनत मशक्कत करती थी, दूसरा वो कर्जा अब कैसे चुकाती कहां से लाती उतने पैसे।

एक एक दिन ज़हर सा जीने से बेहतर उसने मौत चुना।

पता नहीं कितनी पार्वती हर रोज़ दम तोड़ देती है, कोई बीमारी से, कोई भूख से तो कोई लाचार हो कर हार मान लेती है।
जैसे मर जाना आसान होता हो, शायद इतना कठिन और कष्ट होगा जीवन में, शायद उनका जीवन बोझिल होगा समाज के लिए, तभी तो  उनकी बेबस मौत भी हमें चींटी की मौत सी लगती है।

ये समाज, ये ढोंग, ये मुखौटा, ये स्टेटस, ये चमक धमक किस काम की है जब हमारे लिए इंसान के जान की कीमत कीड़े मकोड़ों सी हैं।

विचार जरूर किजिए।

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