नया सवेरा

पतझड़ आया नहीं, पर जिंदगी मुर्झा रही हैं
जीने की इच्छा तो हैं, पर आशा फिसलती जा रही हैं
क्या समय थम गया हैं, या हम चल नहीं पा रहे
खुश तो रहना चाहते हैं, पर ये ग़म नहीं भुला पा रहे
अपनी आँखों के सामने लोगों को मरता देख
बेहते अश्रुओं को सम्भाल नहीं पा रहे
चारो तरफ दुख मे डूबे हुए जहां के बारे मे सोचकर
हृदय की चीखों को दबा नहीं पा रहे

ईश्वर से प्रार्थना कर कर के अब स्वर फीके पड़ गए हैं
पर दुविधा वही पुरानी, बस किस्से नए हैं
किसी अपने को खोने का खयाल जब आता हैं
तब उन्हें बाहों मे भर रोए बिना रहा नहीं जाता हैं

क्या ये हमारे किसी अपराध की सज़ा हैं, या है किस्मत का खेल कोई
क्या अबसे मानवता और प्रगति का कोई मेल नहीं
आजकल हमारा दुखों से ऐसा नाता हैं
के जब कोई नयी उम्मीद लगाए, तब भरोसा बिखर सा जाता हैं

क्या हर एक आशा विफल होगी या ये समय भी बीत जाएगा
मायूसीं के इस दौर को हराकर क्या बीता समय फिर लौट आएगा
क्यूं ना हम एक दूसरे की शक्ति, सहारा और रोशनी बने
क्यूं ना हम उन अनगिनत तड़पती चीखों मे एक नन्ही सी खिलखिलाती हसीं को सुनें

साथ मिलकर लड़ी जाने पर नामुमकिन नहीं है जीतनी जंग कोई
हौंसला और बहादुरी है जहा, सफलता हैं वहीं
इन सब बातों पर ग़ौर करके कहना यहीं है मेरा
के हार मत मानो क्यूंकि अंधेरे के बाद ही हैं सवेरा।

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