ना मांगो, ना रोको, जो मिले स्विकार करो!

हम इंसान भी कितने अजीब हैं,जो लेकर जाना है उसे छोड़े जा रहे हैं
और जो यहाँ रह जाना है उसे जोड़े जा रहे हैं
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि
भगवद गीता में श्री कृष्णा ने कहा है “हे पराक्रमी अर्जुन ! यदि तुम सोचते हो कि आत्मा निरंतर जन्म और मृत्यु के अधीन है, तो भी आपको इस तरह शोक नहीं करना चाहिए।यह जानते हुए कि आत्मा अदृश्य, अकल्पनीय और अपरिवर्तनीय है। आपको शरीर से नहीं जुड़ा होना चाहिए”

हम इस विषय को दो उप-विषयों में विभाजित कर सकते हैं – आध्यात्मिक पक्ष और भौतिक पक्ष –
तो शुरू करते हैं आध्यात्मिक पक्ष से

हम हमेशा अपनी आत्मा के बजाय अपने भौतिक शरीर को खुश करने की कोशिश करते हैं ।मनुष्य के विकास में, हम भूल गए हैं कि हम भौतिक शरीर के साथ आत्मा नहीं हैं, लेकिन हम आत्मा के साथ एक भौतिक शरीर हैं .आत्मा शरीर की चालक है। जब आप आत्मा को नहीं समझते हैं, तो ऐसा लगता है कि मन ही सब कुछ है, लेकिन जब आप आत्मा को महसूस करते हैं, तो आप समझते हैं कि यह आत्मा ही है जो शरीर को चलाती है।

मनुष्य के रूप में हम कभी-कभी वह करने से भाभीत हैं जो हम करना चाहते हैं, हम चिंतित हैं कि पैसा समस्याग्रस्त होगा, इस बात से चिंतित हैं कि दूसरे क्या सोच सकते हैं, यथास्थिति में रहना पसंद करते हैं और अक्सर अपनी सच्चाई को नहीं जीते हैं। हमें अपने सत्य को स्विकार करना चाहिए और उस मार्गदर्शन का पालन करना चाहिए जो भीतर से है।

सदियों पेहले, लोगों ने कभी चीजों की अपेक्षा या इच्छा नहीं की, क्योंकि वे वास्तव में उनकी आत्मा की जड़ों से जुड़े थे। लेकिन आज कल के जमाने में लोगों की अपनी अपेक्षाएं हैं, इच्छाएं हैं जिन्हें वे पूरा करना चाहते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि ये इच्छाएँ आत्मा की नहीं बल्कि भौतिक शरीर की होती हैं।

“इछाओं के रहते प्राण चले जाएं तो वही हुई मृत्यु
और प्राणो के रहते इच्छाएं चली जाए तो हुई मुक्ति”

जब हम अपनी आत्मा से जुड़े नहीं होते हैं, तो हम कुछ बाहरी भौतिक संकेतों का अनुभव कर सकते हैं जो हमारा शरीर हमें भेजता है जैसे की- चिंता, बेचैनी, अवसाद, भय। आत्मा से जुड़ने के कई तरीके हैं , उदाहरन स्वरूप- अभ्यास कृतज्ञता, आत्म ध्यान, अपने अतीत को स्वीकार करें और अपने वर्तमन का स्वागत करे

ये तो बात हो गई आध्यात्मिक पक्ष की, अब बात करते हैं भौतिक पक्ष की
कभी-कभी आप अन्य लोगों के जीवन के पर्यवेक्षक होते हैं और आपको लगता है कि आप कभी अनुभव नहीं करेंगे कि वे क्या जी रहे हैं, चाहे वह सकारात्मक या नकारात्मक स्थिति हो। आप सोचते हैं, “मेरे साथ ऐसा कभी नहीं होगा।”

जीवन की वास्तविक सुंदरता का एक अंग यह है कि यह अप्रत्याशित है। कुछ भी स्थायी नहीं है, सब कुछ बदल जाता है, और निश्चित रूप से, बहुत सी चीजें हो सकती हैं जो आपकी पेहचान बदल देंगी और जीवन की परिस्तिथियों को बदल देंगी .

स्वीकार करें कि यह खत्म हो गया है; स्वीकार करें कि जीवन कठिन है; स्वीकार करें कि आपको स्वीकार कर लिया गया है; स्वीकार करें कि कभी-कभी, आपको स्वीकार नहीं किया जाता है; स्वीकार करें कि कुछ लोग आपको नापसंद करेंगे, और दूसरे आपसे घृणा भी करेंगे; स्वीकार करें कि परिवर्तन जीवन का एक हिस्सा है; भव गीता में भी अंकित किया गया है कि परिवर्तन संसार का नियम है . और ये पूर्ण सुप प्रतयक्ष है.

समय के साथ हालात बदल जाते हैं, परंतु जो हालातों को स्वीकार कर स्वयं को बदल लेते हैं वही बुद्धिमान कहलाते हैं।

स्वीकृति का अभ्यास आपको इस बदलती दुनिया में रहने के लिए तैयार करता है, जहां आप कभी नहीं जानते कि आगे क्या होने वाला है।
मैं स्पष्ट कर दूं कि स्वीकृति कमजोरी से संबंधित नहीं है, और निश्चित रूप से अनुरूपता या सामान्यता का पर्याय नहीं है।

स्वीकृति के कई लाभ होते हैं जैसे की। स्वीकृति आपको अब तक के सर्वश्रेष्ठ जीवन की ओर ले जाएगी – आपको अपने आप पर अधिक विश्वास होना शुरू हो जाएगा। आप अधिक तर्कसंगत रूप से सोचने में सक्षम होंगे। आप फिर से वास्तव में खुश रहना सीखेंगे। आप आगे बढ़ने में सक्षम होंगे। आपको जल्द ही परिवर्तनों को स्वीकार न करने का पछतावा होगा।अगर आंतरिक शांति और संतोष लुप्त हो तो अन्य शांति-सम्पति भी व्यर्थ हो जाती है इसलिए अधिक मांगने, अधिक सीमित करने और चीजों को स्वीकार न करने के बजाय, हमें यह देखना चाहिए कि स्वीकृति की दुनिया कितनी अद्भुत है।

महान कवि हरिवंश राय बचन जी ने एक बार कहा था –
” मैं सागर से भी गहरा हूं,
तुम कितने कंकर फेंकोगे
चुन चुन कर आगे बढूंगा मैं
तुम मुझे कब तक रोकोगे”

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