पंक्ति

हर पंक्ति कुछ कहती है,
बातों का पहाड़ छुपा कर,
फिर भी चुप-चुप रहती है।

हर पंक्ति कुछ कहती है,
इसकी भी धारा बहती है।
थोड़ी अकेली, थोड़ी मिली,
फिर भी चुप-चुप रहती है।

हर पंक्ति कुछ कहती है,
स्याही के बोझ को सेहती है,
अक्षरों को समेट-सहेजती,
फिर भी चुप-चुप रहती है।

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