पंख कतरते हैं

हर बार ऊंची उड़ान भरी थी
आंखों में हर बार वही नमी थी
ऊंचा उड़ना चाहूं आसमां में
कुछ के तन जले तो कुछ के मन।

जितना ऊपर उड़ना चाहूं आसमां में
उतनी काली नज़रे घूरती है हमें
दुआ करती हैं बस मिल जाए तो
कतर कर पंख इसके कुचल दु।

निम्न मानसिकता के साथ न जाने
कितने विछिप्त उठे पंख कतरने को
हम डरे नहीं डटे रहे आसमां में पंख फैलाए
हमनें अपने शब्दों से उनको जगह दिखाई।

हार कर हमसे उन्होंने हर बार हज़ार
तोहमते लगाई कई अपशब्द कहे
पर मां कहती हैं “बातें तो बातें होती है”
तुम उड़ो शरीर में कहां लगती हैं।

इस बार हम दुगने वेग से चले
छूने आसमां को अपने पंख फैलाए
हमनें बिना रुके धरा से गगन को नापा
ऊंचाई से लगा अपनी सोच के साथ ये भी
कितने छोटे है, कितने छोटे है।

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