पृथ्वी क्या है ??

गोल आकृति जिसे भूगोल में पढ़ा
आधी नीली आधी हरी भरी सी,
घुम्मक्कड़ बड़ी अपनी धुरी पर घूमती
365 दिन सूरज की चाकरी में लगी रहती।

पृथ्वी वो माता, वो धरती है जहां
हम सब पाव पसारे “मेरी जमीन है”,
हर वक्त यही दावा करते लड़ते झगड़ते
अपना नया आशियां इसी धरती पे बनाते।

कितना सुंदर होता हम सब मिलकर
खुले आसमां के नीचे साथ सोते,
अपने अपने की होड़ में फिर लाखों
पेड़, जंगल और खेत ना उजड़ते।

चलो ठीक है पर इच्छाएं यही नहीं रुकी
हमें पैर पसारने भर जमीं मिले तो हम,
चौड़े हो कर मस्त बेफिक्र सो जाते हैं
हमारी भूल का नुकसान पृथ्वी मां को होता।

जंगल काटे, नदियां भर दी, पहाड़ों तक
हमने खूब कचरा फैलाया, रसायन उड़ाया,
अब जब खुद की सांसें अटकी हुई है
तो ऑक्सीजन ढूंढते फिर रहे हैं।

प्रदूषण नियंत्रण और ग्लोबलवार्मिंग का
रोना रोते हैं, पेड़ लगाओ चिल्लाते हैं,
खुद ही प्यारी प्रकृति को जी भर नुकसान किया
अब उसी को बचाने की मुहिम चलाते हैं।

पृथ्वी कितनी अनोखी सुंदर प्यारी थी
नव ग्रहों में अनमोल जहां जीवन है,
अनेकों प्रकार के पशु पक्षियों से भरी
ढ़ेरों हरियाली से सजी संवरी दुल्हन सी।

हमनें एक एक कर पृथ्वी से उनका
बड़ी बेदर्दी से किमती गहना छीना है,
अब हम इतने आगे निकल आए
जहां से मनुष्यता शर्म शार है।

हमनें खुद का ही सुंदर घर उजाड़ दिया
अब न तो शुद्ध हवा है, ना शुद्ध मिट्टी ही बची,
पानी की घुट को भी कुछ दिनों में तरसेंगे हम
अन्न हमारा दूषित है, अब! हम कैसे जीएंगे??

सोचिए अभी भी बहुत देर ना हुई
पृथ्वी के लिए सुखों की आहुति दीजिए,
वरना अब एक बार फिर युद्ध होगा
वज़ह हमारी भूख और प्यास बनेगी।



ये बहुत चिंता का विषय है। गंभीरता से इसपर विचार अवश्य करें। खुद भी जागे दूसरी को भी जगाए।

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