प्रयास

अतीत मेरा समा गया उसमे वो ऐसा घनघना तिमिर था
मिरमिरकी आशा कैसे रखता जब सूर्यपे छाया शिशिर था

मैं सागर, मेरे अश्क बूँदबूँद आसमानपे टपक रहे थे
बनके बादल वो घटघट सिरकसिरकके सिसक रहे थे

शक्ति सहयोगिनी मेरी आ बैठी थी मनके भीतर
पर उसके मौनसे तड़पे भाव सभी गये थे छितर

ढूंढ रहा था नये जहानमें पर जनजनमें नयी कहानी थी
जाने कहाँ छूट गयी मुझसे आदत जो मेरी पुरानी थी

नेत्र मनमें पलपल यादोंकी चलचित्रपे झांक रहे थे
बाहर के सभी चेहरोंमें बस उसे ही वो ताक रहे थे

बिछोहमें रहते रहते नवमास दोबर बीत रहा था
तब एक पारिजातको देख वसंत परिसर हो रहा था

मेरे गुमसुम मुहारने प्रेमसे सन्यास केवल लिया नहीं
धन्य हूँ मैं जो समयपे ‘प्रयास’ने जन्म लिया तबहिं

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