प्रेम जाल

एक शाखा प्रेम की, बंधी थी जो तिनकों से
घोंसला पुराना था, उम्मीदें नई सी जागी थी,

प्रेम का आधार था, विश्वास की डोर में
एक एक तिनका, भावनाओं से था जुड़ा

बंदिशों में थी खड़ी, वो घोंसलें की दीवार
शाख भी कमज़ोर थी, जिसपे उम्मीद थी पली

एक झोंका छलावा का, संदेह मन में लिए
निकला था गुरूर में, घोंसले को तोड़ने

ऐसा जाल फेंका था, छल ने सब उजाड़ दिया
तिनका तिनका भावनाओं का, अश्रु बन बिखर गया

शाख भी वो टूट गई, प्रेम था जिसपे टिका
विश्वास की डोर भी, आधार से विलग हुई

बंदिशों में थी बंधी, घोंसले की वो दीवार
उम्मीद के साथ ही, धीरे धीरे टूट गया

घोंसला उजड़ने से, पंछी बेघर हुआ
पर जहां आज़ाद नही, वो कैसा घर हुआ

प्रेम के उस जाल से, पंछी अब आज़ाद हुआ
खुले आसमान में, फैला के पंख उड़ चला।

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