फ़ीकी चाय

.चाय की चुस्कियां थीं,, हंसी ठिठोली भी …और कैन्टीन में कुछेक तलबगार । वो शामों का दौर था, दो चुस्कियां और चार नज्म हुआ करती थी ,, किसी की आंखों पर तो कभी किसी की मुस्कुराहट पर। इक्का दुक्का थे जो चाय भी निगलते थे…मजाल है जो जबान छू जाए । हां ,वही हमारे ग़ालिब का हनी सिंह बनाती थी । आज की चाय में वो बात कहाँ , जबान छूती है तो जल उठती है…, फ़ीकी हो गई है बगैर दोस्त , बिना नज्मों के। तुम आ जाओ तो शायद …..
अमरीश सैनी

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