बचपन

यादों का गलीचा ..
आज फिर कुछ धूल से सना,
कुछ गीला थोड़ा मटमैला सा !
नंगे पांव बरसात में भीगता बचपन
कीचड़ को हवा में उछालने की ..
शरारत भरी कोशिशें,
कागज की कश्ती के साथ साथ चलते ..
नन्हे सुनहरे सपने,
गुल्ली डंडा या कबड्डी,
लुका छिपी या डेंगा पानी..
हर खेल में जीतने या हारने के बाद –
खिलखिलाते या मुंह फुलाए मासूम चेहरे .
धूल से भरी गलियों में
या कभी पानी से लबालब रास्तों पर ..
दौड़ते, गिरते, चलते वो नन्हे कदम ..
यादों का गलीचा..
आज फिर धूल से सना ..
कुछ गीला, थोड़ा मटमैला सा !
स्वरचित @ निशीथ सिन्हा

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