बनिये की हट्टी

बनिये की हट्टी में
जो गिरवी रखी होती है
चीज़ वो घट जाए
कभी बढ़ती नही होती है
इस बात का फायदा
मैं आज उठा आया हूँ
अपनी जवानी की उम्र
गिरवीं मैं चढ़ा आया हूँ।।

देखता हूँ कि अब
कब तक वो संभाले गा इसे
बदले में उसकी थोड़ी सी
शराफत ले आया हूँ,
धीरे धीरे ब्याज ही
मैं उसे लौटेगा
शराफत मुझमे है थोड़ी
थोड़ी दे दूँगा तुझे।।

अब अगर असल की
बात मुझसे पूछेगा
पहले उससे मैं ये
वादा लूंगा
कह दूंगा की
जवानी कम नहीं होनी होगी
और बनिये की दुकान
चलाने के लिए
थोड़ी सी शर्म, शराफत की
कमी होनी होगी।।

फिर ये देखेगे जब
सब यार बुढ़े होंगे
तब जा के उसको
सारी शराफत लौट देंगे
असल लौटा के उससे
अपनी जवानी लेंगे।।

जवानी जो हो तो
शराफत को कोई काम नही
अब हमें क्या जो
अब
बनिये की दुकान नही।।

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