बसंत आगमन

ज़रा देखो तो पतझड़ गए क्या
कोंपलें फूटीं और गुल खिले क्या
हवाओं ने गर दस्तक दी हो तो पूछ लेना
भँवरे और फूल आपस में मिले क्या

ये ठंडी हवाएं जो गुज़र रही हैं
मेरे बुलाने पे मुकर रही हैं
तुमसे गर रुखसत हों तो पूछ लेना
बर्फ और पर्वत लिपटे हुए थे
सूरज की किरणों से बिछड़ गए क्या

कोहरे की चादर से ढका हुआ था
दिन और रात का हर पहर जुदा था
जो मिलें वो बूंदें पत्तों पे लेटे
उन्हे जगाना और आहिस्ता पूछ लेना
बसंत आ गई अब हम चलें क्या

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