बहुत कुछ है

 बहुत कुछ है कहने को मानो जैसे समुन्द्र सा उबाल हो और भीतर एक अजीब सा सन्नाटा। ऊपरी दर्द बयां करना आसान हो भी जाए तो उस चोट या ज़ख्म का क्या जो आज मुझे अंदर – से खाए जा रही है और ये अंधेरी काली रातों में अंधेरों से घिरी मैं और मेरी ख़ामोशी जो चीख – चीख कर कागज को न जाने क्या बताना चाहती है, कौन – कौन और कितने दर्द गिनना चाहती है। 

दिन भर की हँसी – मुस्कान जाने कहाँ खो जाती है और मै खोती जाती हूँ किसी अंधेरे में। दोस्तों का साथ सही है, परिवार का प्यार भरपूर है। फिर भी कुछ अधूरा – सा लगता है जैसे कुछ है जो आगे है या कुछ था जो पीछे नहीं होता तो शायद ज़्यादा सही रहता। 

बार – बार खुद को पहले से ज्यादा बुरी तरह तोड़ना और खुद ही समेटना। एक बार हो तो अनजाने में मान भी लें फिर दूसरी और तीसरी बार क्या इसे जान बुझ कर खरीदा गया दर्द नहीं कहेंगे? 

कभी – कभी खुद को खुद से बचाना जरूरी लगता है। जाने खुद को कब बचा सकूँगी मैं। 

– Isha

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