भीगता सावन

शाख़ दर शाख़ झड़ते पत्तों की तरह… आँख बरसती रही, तरसती रही रात भर। कोई सुलाने ना आया, ना ही कोई दिलासा देने। भीतर ज़मीन बंजर सी हो गयी है शायद…कई बार नये पौधे सींचे मगर मुरझा गये…,उन पर कोंपलें भी फूटती नहीं। हरियाली बगैर मौसम नीरस सा हो गया कुछ…
सावन का एक मौसम यूँ भी गुज़रा….मै उसकी ज़ुल्फ़ की घनी छाँव में बेसुध सोया था, हलके से एक हवा के झौंके से ज़ुल्फ लहरायी और रौशनी से आँख ने नींद का दामन छोड़ दिया। उलझी निगाहों से जाने कब से निहार रही थी वो। एक लट लहरायी और आँख में समा गयी…,एक क़तरा आँख से पलकों के किनारे आकर रुक गया, जैसे कह रहा हो….,ये दिन गुज़र ना जाएँ कहीं, यूँ ज़ुल्फ़ के साये नसीब हों ना हों…,मै तुम्हारे साथ हमेशा रहूँ ना रहूँ, बेमौसम बरसात हो ना हो,,,ये तन्हा पल ना हो…
आँख से निकला वो एक क़तरा आज भी मेरी गालों पर अपनी मौजूदगी का एहसास दिलाता है।

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