मंज़िल

मैंने देखा है लोगों को अक्सर एक ही काम में ज़िन्दगी गुज़र करते, कभी अपनी ख़ुशी से, अपनी पसंद से तो कभी बस यूँ ही बिना किसी वजह के…मैं देखता हूँ उन्हें तो कभी कभी खुदसे ही चिड़ होती है के कोई कैसे हर रोज़ एक ही काम में, वही एक सी ज़िन्दगी में खुश रह सकता है?? जब कि मैं किसी चिड़िया की तरह कभी पेड़ की किसी एक डाल पर तो कभी किसी छत की मुंडेर पर, कभी किसी खिड़की के शीशे में बैठा उस पर अपनी चोंच मारता भटकता रहा हूँ अपनी मंज़िल अपने ठिकाने की तलाश में…उस चिड़िया की तरह जो घोसलों में रेहना तो जानती है पर उन्हें बनापाना नहीं…मुझे रोष होता है के मैं कभी खुदको किसी एक तरफ किसी एक राह पर क्यों नहीं रुक सका। वो ठहराव मैंने खुद के भीतर कभी क्यो महसूस नहीं किया!!!

जब भी कभी किसी विराम पे ठहर कर खुदके भीतर देखता हूँ संतुष्टि वो सुकून कहीं नहीं मिलता, बाहर बहती हवाएँ इस तरह मुझमें घुल सी जाती हैं, के लगता है उन्हीं में मेरा घर है, और मैं निकल पड़ता हूँ फिर किसी नई मंज़िल किसी नई तलाश में।

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