मासूम बचपन और उलझती ज़िंदगी

….कि आ फिर बैठकर बचपन से गुफ्तगू करते हैं घड़ी भर,,,,,उसकी नादान बातों से उलझती जिंदगी का मांझा सुलझा लिया जाये ,,और दूर कहीं से आती बोझिल सी अपने बचपन की याद मे खो भी जाऊँ मगर,,,बीते कुछ बरस की आग उन पन्नो को स्याह कर देना चाहती है ,जिन पर हँसती मुस्कुराती स्याही ने मासूम से सैंकडों हरफ़ दर्ज किये थे कभी,,,,…हजारों ख्व़ाब तबाह किये हैं इन बेचैन रातों ने, फिर भी ये ढीट दिल बचपन के बगल मे किसी दरख्त के तले बैठकर हवाओं पर रोज़ नये ख्व़ाब उकेरता है।
✍ & 📷 अमरीश सैनी 🌿

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