मुझे डर है

मुझे डर है कि कहीं वह दिन न आ जाए,
जब मैं मुसकुराना ही भूल जाऊँ,
मैं भूल जाऊँ कि किस तरह आखिरी बार मुसकुराई थी,
और किस वजह से मुसकुराई थी।

मुझे डर है कि कहीं मैं ये न भूल जाऊँ
कि किस तरह कोई मुझे मेरे रूठ जाने पर मनाता था,
मुझे डर है कि कहीं मैं इन आँसुओ के साथ जीना
ही न सीख जाऊँ,
इस स्थिति में तो खुद से भीख मांगनी पड़ती है
कि नहीं बस अब और नहीं, ये आँसू और नहीं।

मुझे डर है कि कहीं मैं इस स्थिति में जीना ही न
सीख जाऊँ।

और हाँ,
मुझे इस बात का डर भी है कि तुम्हारा चेहरा
तो भूल ही चुकी हूँ, अब कहीं तुम्हारी आवाज़ भी न
भूल जाऊँ

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