मेरी चाहत

न मजबूर होना चाहती हूँ, न मग़रुर होना चाहती हूँ
कुछ हो सकूँ अगर तो मजबूत होना चाहती हूँ।
न रोके रुकना चाहती हूँ, न तुमको रोकना चाहती हूँ
मैं बस अपने सफर पर चलते रहने चाहती हूँ।
हवा का रुख मोड़ना चाहती हूँ न तारे तोड़ना चाहती हूँ
अपनी जिंदगी में अपनी छाप छोड़ना चाहती हूँ।
न हरदम की तन्हाई चाहती हूँ न भीड़ में खोना चाहती हूँ
कभी कोई हमकदम, कभी तन्हा कोना चाहती हूँ।
न दिलासे चाहती हूँ ,न कुछ सुन के चुप होना चाहती हूँ
अगर रोना आया है तो बस रोना चाहती हूँ।
बेजा अधिकार चाहती हूँ न तुमपे इख़्तियार चाहती हूँ
बस अपने हाथों में अपनी पतवार चाहती हूँ।
गुनहगार न हो जाऊं कभी, ये तो बेशक चाहती हूँ
गलतियाँ कर सकूँ इतना भी हक चाहती हूँ।
लम्बी मेरी फेहरिस्त नहीं, कुछ चीजें चुनिंदा चाहती हूँ
इस जिंदा तन में मैं मन भी जिंदा चाहती हूँ।

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