मेरे अदंर का कवि

अक्सर मैं अपने चेहरे को खुली किताब कहा करती हूँ, दिल में जज्बात और आंखों में तहजीब रखा करती हूँ, कानों को संयम और मन को स्थिरता सिखाया करती हूँ ,
अक्सर मैं अपनी नाक को खुद ही झुका लिया करती हूँ अह्म के वह्म में नहीं रहना है खुद को यह बताया करती हूँ,
शंका अभिप्राय को खुद से दूर रखकर वाणी मीठी रहे ऐसी सावधानियाँ बरता करती हूँ,
लोगों की अपेक्षा, और मुझसे सुख की चाह भले ही मैं पूरी ना कर पाऊँ,
पर जिम्मेदारी पूरी करते वक्त किसी को दुख ना हो जाए अक्सर मैं यह दोहरा लिया करती हूँ।
हाँ गुनाह तो अक्सर हो जाते हैं,पर दिल से माफी मांगने में हिचकिचाया नहीं करती हूँ,
व्यक्तित्व साफ और सरल रहे इसके लिए अक्सर सीमाएं अपने लिए खुद ही बना लिया करती हूँ
हाँ डर से डर तो बहुत लगता है;
पर अक्सर डर के साथ मैं खेल लिया करती हूँ।
बहुत बार लोगों का दृष्टिकोण मुझसे अलग होता है;
पर मैं अपना नजरिया थोपती नहीं हूँ,
उनके मंतव्य को स्वीकार कर लेना ज्यादा आसान होता है यह कहकर खुद को मना लिया करती हूँ। दूसरों के दोष देखने से पहले अक्सर मैं आईने का दीदार करना पसंद करती हूँ,
घुट्टी में अपमान मिला हो तो भी उसे पी जाया करती हूँ,
क्योंकि यही कड़वापन मेरे मन को कांति देता है; इस राज को अपने मन में ही दबा लिया करती हूँ।
यही मन की कांति सार है मेरी छवि का और इससे ही जन्म हुआ मेरे अंदर के कवि का ।।

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