शांत मन

क्यों शांत है मन,
क्यों झुके हैं नयन,
नज़ारे हैं कई,
क्यों नज़रे हैं मगन।

क्यों शांत हैं मन,
क्यों स्थिर है तन,
दोष तुम्हारा है,
क्यों द्वेष ही सहारा है।

उठो, जागो, बढ़ो, कहो,
पल हाथ में पल भर है,
जीवन आज और कल भर है,
पताका कर रहा हवा से बातें,
तुम व्यर्थ ही ले बैठे वो बिखरी सौगातें।

आँखें उठा कर ऊपर देखो,
वह बादल की कला कृति,
बयां कर रही तुम्हारी जागृति,
श्वेत है बादल,
श्वेत है तुम्हारा आँचल।

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