सब कहते हैं

चेहरे पे गिरती हया की लटें,
कानों के पीछे छुपा लेती हो,
ज़ुल्फ़ों से कितना कुछ कहती हो,
और सब कहते तुम चुप रहती हो |

नटखट मन की चंचल बातें,
पलकों से ही सुना देती हो,
आँखों से कितना कुछ कहती हो,
और सब कहते तुम चुप रहती हो |

अरमानों भरे दुपट्टे को,
उँगलियों में ही घुमा लेती हो,
हाथों से कितना कुछ कहती हो,
और सब कहते तुम चुप रहती हो |

आखें और हथेली बंद करके,
दूर से ही गले लग लेती हो,
तुम हमसे कितना कुछ कहती हो,
और सब कहते तुम चुप रहती हो |

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