सरहद

सरहदों की हदें आजादी पाने के लिए चीख रही है ;
मुनासिब नहीं है एक दूसरे की हदों को दबोचना,
अब तो वो भी सीख रही हैं ।
जंग में वक्त जाया ना करो,
तुच्छ इंसान से, वो भीख मांग रही हैं ।
मुल्क हो या देश क्या फर्क पड़ता है,
है तो मातृ वतन ही
धर्म हो या मजहब क्यों तर्क करता है ,
है तो उनके जरिए ऊपर वाले को पहुंचता हमारा वंदन ही।
भाई की भाई के खिलाफ ही फरियाद है ,
जब बिछड़े थे तो दोनों रोए साथ थे याद है?
आखिर क्यों एक जमीन के टुकङे के लिए चल रहा इतना बड़ा विवाद है?
काम नहीं आए अस्त्र तो विषाणु को ही बना लिया शस्त्र !
ओछे मनुष्य ये किसे बना लिया तूने अपना ब्रह्मास्त्र?
एक बार उन मासूमों के दिलों में दाखिल होकर देखो; जिन्होंने इस जंग में अपनों को खोया।
बदकिस्मती थी जब हमारी मां का बंटवारा हुआ, अब तो जगाओ अपने जमीर को जो है सोया, चलो पोषित करते उस बीज को हैं,
जो हमारे पूर्वजों ने बोया।
धरती मां की संतान हम सब एक हैं ,
फिर क्यों आपस में द्वंद्व अनेक हैं?
एक दूसरे की सीमाओं का आदर करते हैं,
कांटो को फुलवारी बनाते हैं,
आओ ना वसुधैव कुटुंबकम की भावना को और गहरा दिलों में उतारते हैं ।
एक दूसरे पर अपना वर्चस्व दिखाने
में कहीं हम इंसानियत को ही ना भूल जाए,
कहीं ऐसा कोई नुकसान ना कर बैठे कि हमारी आने वाली पीढ़ी को उसकी कीमत चुकाने में उनकी सांस ही ना फूल जाए।।

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