सिमटते दरख़्त और उखड़ते साँस

यार बैठते थे कभी इकट्ठे, दिन निकलता था तो चमक उठता था बदन। जेठ की दोपहर तेरे सायों की ठंडक में गुजरती थी और दूर से आई हवा पत्तों से झूला झूलकर शाम हसीन कर जाती थी। तूने अपनी टहनी, शाखों पर परिंदों के साथ मुझे भी झुलाया है। आज तू अकेला खड़ा है अपने उस दोस्त के साथ, जिसने मुझे एक बार गिराया था । तेरी जरूरत ही कहाँ रही है …घर में ए सी ले लिया है मैने,, तुझसे ठंडी और ताजा हवा देता है, भीतर की गर्मी बाहर फेंकता है । तू ही मूढ़ रह गया बस .,..ठुठ की तरह खड़ा है गरम हवाओं को सोखता। तेरी जगह अब घर के गमलों ने ले ली है और तेरे झूलों से अच्छा मैने एक घर के बरामदे में लगाया है । परिंदे भी रह लेंगे यहीं कहीं,, दूर पास। तू भी एक दिन कट जाएगा अपने यार दोस्तों की तरह। कहा तो था ..अपनी अकड़ थोड़ी ढीली कर, नरमी ला। मै आदम हूँ,, कुछ भी कर जाऊँ । बस तू जो ये सांस छोड़ता है ना,, उतने से मेरी सांस चलती हैं … और कुछ नहीं ।

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