सुनलो नारी की पुकार

जिस देवी तुल्य काया पर नजर तू जमा कर बैठा है, जिसको तू अपनी हवस का शिकार मान कर बैठा है,
शर्मिंदा नहीं है तू उससे भी जिसे गलत नियत से छूकर बैठा है ,
दरिंदा नहीं तो और क्या कहूं तुझे ?
तू तो भरी महफिल में भी अपनी दरिंदगी का नमूना दे कर बैठा है,
देख तेरे आते ही कैसी मनहूसियत सी छाई है;
तेरी अपनी पत्नी, मां ,बहन और बेटी की आँख भी उस हैवानियत के खौफ से भर आई है।
याद रख अंधेरा तो आफताब के होते हुए भी तेरे मन में रहेगा ही,
अरे डरले थोड़ा उस नर्क से;जहां पर तेरी मौत के बाद भी उस जघन्य अपराध का हिसाब पूरा होगा ही।

आज एक बात बता दे दरिंदे; अपनी मां की हँसी से डरता है क्या तू ?
या अपनी पत्नी के आंसुओं पर अपनी खोखली मर्दानी पर मरता है तू ?
कहीं तेरी बहन की खिलखिलाहट ही तेरे लिए संकोच तोनहीं?
या तेरी अपनी बेटी तेरे लिए कहीं बोझ तो नहीं ?
सुन नारी तुझे ऐसे दरिंदे पगपग पर मिलेंगे जो, तेरे ही आंसुओं की बूंदों से और खिलेंगें ।
बचा ले तू अपनी लाज उन मुखौटा पहने लोगों से ;जो मंदिर में तो अक्सर देवी की पूजा करते हैं पर मन शांत होता उनका जिस्मों के भोगों से है।
तू जरूर चंडी ,काली शक्ति का रूप धर उस हैवान को मिटाना,
पर याद से अपने बेटे की मां बन कर उसे धृतराष्ट्र का दुशासन या उसकी मूक सभा के गुण नहीं कृष्ण के संस्कार जरूर सिखाना ।।

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