सुबह

धीमी सी आंच पे, यादें पका रही हूँ,
भिगोये कुछ लम्हे, धूप में सुखा रही हूँ,
मिला दी तीन चम्मच चीनी, उन्हें ज़ादा पसंद है,
चहक के उठा दे उन्हें दिल, उनकी आँखें अभी तक बंद हैं |

उँगलियों से सपने मलते, ख्वाबों से निकलेंगे,
और मेज़ पर बैठ के, प्यार की चुस्की लेंगे,
दुनिया उठा लाये बहार से, पर ऐनक भूल गए,
रोज़ की आदत है, पर टोकने पर रूठ गए |

लम्हे सूख गए, और खुशियों की सब्ज़ी तैयार,
स्पर्श के पराठे भी लगा दिए सामने चार,
पिघला गुस्से का मक्खन, पराठे पर जब लगे हाथ,
इस तरह हुई, हमारी और उनकी, एक और सुबह की शुरुआत

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