हे राजनीति के पत्थर मानुष

हे राजनीति के पत्थर मानुष क्या अब भी तेरा हृदय ना डोला
ये चीख पुकार ये हाहाकार
बिखर गया सबका संसार
उस माँ को देख उस पिता को देख उस बेसुध पड़ी विधवा को देख
ना पुत्र रहा ना पति रहा अब कौन सम्हालेगा परिवार
नम आँखों से काँपते हाथों से
चिता को अर्थी देता पिता वो बोला
हे राजनीति के पत्थर मानुष क्या अब भी तेरा हृदय ना डोला

अभी कल ही तो कहा था वो आएगा
मेरी सारी खुशियां साथ लाएगा
जब पहली बार मिले थे हम मैंने उस मिलन के कपड़े पहने थे
इतने दिन की जो बातें थी सब एक साथ उसे कहने थे
अब क्या हुआ मैं कबसे बोल रही वो चुप क्यूँ है
आँखों को बंद किए वो चुपचाप लेटा बेसुध क्यूँ है
पूछो न रूठा है क्या मना लूँगी
वो साथ रहे बस सारे दुख उठा लूँगी
ये व्यथा कहते कहते मेरा मन क्षोभ से बोला
हे राजनीति के पत्थर मानुष क्या अब भी तेरा हृदय ना डोला

ये सुनकर कि मेरी नौकरी लगी माँ ने कहा था खीर बनाएगी
वर्षों बाद वो खुद अपने हाथों से खिलाएगी
जब घर पहुंचा वो लेटी थी
मेरे हिस्से का प्यार अभी भी समेटी थी
वो खीर का प्याला मिला नहीं
आशीर्वाद देने तक को हाथ हिला नहीं
पिताजी ने कहा वो नहीं रही
बस तेरे आने की कमी रही
तू कितना प्यार करता था तुझे खुद बताना होगा
कुछ दिनों बाद ब्राह्मणों को वो खीर खुद खिलाना होगा
ये व्यथा सही ना गई इसलिए मैंने आज अपना मुंह खोला
हे राजनीति के पत्थर मानुष क्या अब भी तेरा हृदय ना डोला

हे राजनीति के पत्थर मानुष
अगर अब भी हृदय ना डोला तो चूड़ियाँ टूटती रहेंगी
पानी में तैरती लाशों के साथ श्मशानों में लपटें उठती रहेंगी
विनती है तुमसे उठो चलो अपने हिस्से का काम करो
जिस दिन के खातिर चुना तुम्हें उस दिन की अच्छी शाम करो
जो लगे हैं जान बचाने में उनमे नई ऊर्जा नई जान भरो
तुम सक्षम हो गर ठान लिया
गर अपने चित का आह्वान किया
बताओ की मानवता ज़िंदा है
भले दुनिया करती तेरी निंदा है
विश्व गुरु हम कहलाते
क्यूंकी मानवता क्या है ये हैं दिखलाते
तो कहो की हम लड़ेंगे जीतेंगे विपदा हारेगी
ये भयावह दिन गुजरेगा ये कठिन रात भी जाएगी
और हम उम्मीद करें की आने वाली सुबह एक नया जीवन दिखलाएगी

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