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Poetry
Keep Going
By Gaurav Gangmi Thapa When the road feels heavy and the night is long, Remember the strength that’s kept you so strong. Each step that you take, though it may feel small, It’s part of a journey; you’ve conquered it all. In moments of doubt, when shadows take flight, Look deep within; you’re a beacon of light. Each challenge you face is a chance to grow, A seed that you’ve planted, soon destined to glow. The mountains you climb may seem steep and wide, But within you is coura
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Dec 12, 20251 min read
What Is Maturity
By Gaurav Gangmi Thapa What is maturity? Is it taking responsibility, Or maybe just speaking less, seeking simplicity? Maturity is more than a single trait, It’s a blend of understanding, a thoughtful state. Is it knowing when to act, when to pause, Navigating life’s challenges, without a cause? Yes, it’s in the choices we make each day, Finding strength in our hearts, in what we convey. What about being quiet? Is that the key? A calmness that helps us truly see? Being quiet
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Dec 12, 20251 min read
Life
By Gaurav Gangmi Thapa Once a curious kid asked, “What is life?” And the wise one replied, “A bed of roses, Where beauty blooms with petals bright, Yet hidden are the painful thorns that pose.” We gather memories, both sweet and sour, Moments of laughter, tears that flow, Each experience shapes us, hour by hour, In the tapestry of life, we learn and grow. Life is our journey, a quest for rest, To lie upon that bed until we dream, Finding comfort in the moments we cherish best
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Dec 12, 20251 min read
कल रात मेरे सपने में
By Anjali Kumari कल रात मेरे सपने में एक लड़की आई, काजल फैला, बाल खुले, आँखों में आँसू, होंठों पर चुप्पी, और दिल में दर्द समाये, कल रात मेरे सपने में एक लड़की आई। उसके बाल उसके चेहरे को ढके हुए थे, सो, मैं उसका चेहरा देख न पाया। बाल हटाए, चेहरा देखा, डर गया, मैं कुछ समझ न पाया। ये तो वही लड़की है, जिसकी इज्ज़त कल रात मेरे सामने लूटी गई थी, इसकी चीखें मेरे कानों में गूँज रही थी, यह लड़की मेरे सामने मारी गई थी। मैं चुप-चाप खड़ा देख रहा था, क्योंकि डरा हुआ मैं भी था। वो आ
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Dec 12, 20252 min read
पिया के संग चली सिया माता
By Anjali Kumari स्थाई :- पिया के संग चली सिया माता छोड़ मिथिला प्रदेश को किसी अन्य से जोड़ के नाता पिया के संग चली सिया माता । अंतरा :- 1 राजकुमारी माता का आँचल लिए तनिक संकुचाई बोली न कछु बस देंखि - देंखि लज्जावश ही मुस्काई अँसुवन से अँखियन को भिगोए अँखियन में नए स्वप्न संजोए सोंचि रहीं आभार करूँ कैसे ? तुम राम दिए जो विधाता । पिया के संग चली सिया माता.. अंतरा : - 2 जनकसुता बनने चली अब राघवप्रिय, देखो! लक्ष्मीनारायण का पुणः पाणिद्वय, देखो! अंजुरी से मुख को छुपाए हृ
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Dec 12, 20251 min read
देख ले तू भी ख़ुदा
By Anjali Kumari देख ले तू भी ख़ुदा, मैं डायरी सी हो गयी स्याहियों के जैसे ही पन्नों में दब के सो गयी। आज जब मैंने अचानक देखा ख़ुद की ओर है आँखों में पानी छुपाए फिर रही थी, रो गयी। मैं भटकती रह गयी आए न तुम इक बार भी आओगे तुम ढूंढने, उम्मीद थी, सो खो गयी। सोच कर इस बात को मैं रात दिन रोती रही कल तलक तो सब सही था, बात अब क्या हो गयी। साथ रहकर तेरे 'सादिक़' रहती थी ख़ुशरंग ही याद कर उन हर दिनों को जाने क्यों मैं रो गयी। By Anjali Kumari
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Dec 12, 20251 min read
आग़ाज़
By Anjali Kumari सुनो! अन्याय जब-जब हो किसी को उठना पड़ता है समय अब आ गया देखो, नया अध्याय खुलता है। सताए जो भी जाते हैं, वह कुछ दिन शांत रहते हैं पलटकर फिर नए युग का वही आग़ाज़ करते हैं। जगेगा ये जगत फिर से, कि सब को होश आएगा दबी थी चेतना सब की, उसे अब वह उठाएगा। समय की माँग रहती है, कि खुद को दोहराना है चला जो कल गया था कल उसे फिर लौट आना है। बदलती आत्मा क्या है भले तन बदले ये जितना? पुरानी सोच का तय है नए आकार में ढलना। दलित, स्त्री, आदिवासी हो या हो कोई विमर्श और धुरी ह
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Dec 12, 20251 min read
मैं कौन हूँ ?
By Anjali Kumari सही-ग़लत के मध्य की रेखा वही समझ लो तुम मुझको; नीति-अनीति के द्वंद्व के बीच कहीं मिलूँगी मैं तुझको। दोनों पहलू घर है मेरा कभी इधर तो कभी उधर; कभी साँझ की छाया हूँ मैं कभी कड़कती दोपहर। कहीं रीति के बंधन में दबी हुई हूँ सदियों से; कहीं विरोधाग्नि लिए तड़प रहीं हूँ सदियों से। कहीं भयावह दुष्टों से लड़ रहीं हूँ काली बन; कहीं सहम कर बैठी हूँ अबला सी इक नारी बन। रंग-रूप है इतना कि ऋषियों का चित्त भी हर लूँ; देख के जग घबड़ा जाए वीभत्स रूप जो धर लूँ। सतीत्व मेरा पद्मिनी
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Dec 12, 20251 min read
गिनती
By Anjali Kumari चलो करते चलो गिनती कि कुछ गिनना ज़रूरी है; ख़ुशी-ओ-ग़म के बीचों-बीच में चलना ज़रूरी है। अगर तुम देखो तो इक पन्ना सुखसागर के जैसा है; तो फिर दुख से भी तो इक पन्ने का भरना ज़रूरी है। चलो अब खोलते हैं एक बचपन का हसीं पन्ना; जहाँ की गिनती केवल मुस्कुराहट में ही होती थी। पिता की पीठ पर यूँ बैठ सब कुछ भूल जाती थी; वहीं माता की गोदी में नए सपने पिरोती थी। कि देखो आता है जीवन का अब वो उलझा अफ़साना; जहाँ पर दुख-ओ-सुख की गिनती इक ही साथ चलती है। कभी आँधी ही आती है महज़ तकलीफ़
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Dec 12, 20251 min read
भावों के बुलबुले
By Anjali Kumari धीमी-धीमी आँच पर, सुलग रहा कुछ ख़ास है तड़प है, घुटन है, अज्ञात एक प्यास है। हल्के-हल्के बुलबुले, उठके फूटते हुए फूटकर फिर बनेंगे, मन को यही आस है। क्षणभंगुर ये बुलबुले कितने क्षण संभलेंगे फिर? हल्के नाज़ुक बुलबुले कैसे घात सहेंगे फिर? सतही ये बुलबुले, जड़ में कैसे जमेंगे फिर? मिट जाएँ भावों के बुलबुले, जो? या बच जाएँ अगर किसी तरह वो, क्या हो, क्या हो, क्या हो फिर? हृदय को झकझोड़ते इस प्रश्न का उत्तर है क्या? क्षणभंगुर यदि बुलबुले, तो, क्षण भर का यह देह भी है
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Dec 12, 20251 min read
സസ്യപ്രതിജ്ഞ
By Deepa Santosh ആരോ പാകിയ ബീജത്തിന് നീരുറവയേകി മറ്റാരോ.... അരുണരശ്മികൾ അകമ്പടിയേകി തുടിച്ചുയർന്നു ജീവസ്ഫുരണം... ഉയിരു വന്നു തളിരു വന്നു സസ്യശ്രേണിയിൽ ബാല്യം... ദളപുടങ്ങളാൽ മേനിയഴകേകി ഹരിതനിർഭരമായ് കൗമാരം... പരാഗണത്താൽ പുഷ്പിണിയായ് ഋതുമതിയായ് യൗവനം... പതംഗങ്ങൾക്കും ശലഭങ്ങൾക്കും സംരക്ഷകയായ് മാതൃത്വം... ജീവവായുവും തണലുമേകി പടുവൃക്ഷമായ് വാർദ്ധക്യം... എല്ലാം ഞൊടിയിടയിൽ തച്ചുടയ്ക്കാൻ തൻ ജീവവായു നുകരും മഹത്സൃഷ്ടി... "മാനിഷാദ" "മാനിഷാദ".... മിഴി തുറക്കൂ... മഴു തടുക്കൂ... ...
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Dec 12, 20251 min read
അമ്മ
By Deepa Santosh അന്ധകാര ചക്രവ്യൂഹത്തിനുള്ളിൽ സർവ്വവും തന്നെന്നെ സൃഷ്ടിച്ചു... ജീവസ്സും തേജസ്സും ചൊരിഞ്ഞു പൂര്ണയായി പോഷിപ്പിച്ചു... തീവ്രവേദന തൻ രോദനത്തോടെ എനിക്കു സ്വാഗതമരുളി... മാറിൻ പാനപാത്രത്തിലെ ക്ഷീരമാവോളം പകർന്നുനൽകി... എൻ വളർച്ചയുടെ പടവുകൾ ത്യാഗാർപ്പണത്താൽ ആസ്വദിച്ചു... പിച്ചവയ്ക്കാനും കുണുങ്ങിയോടാനും വീഴ്ചകളിൽ ഗുണപാഠങ്ങളേകിയും ആനന്ദാശ്രുവാൽ പുളകിതയായ്... ചുംബനം കൊണ്ടും ആശ്ലേഷം കൊണ്ടും മാതാനുഭൂതിയിൽ നിറഞ്ഞാറാടി... അക്ഷരങ്ങളെ സഖികളാക്കാനും അക്കങ്ങളെക്കാൾ കണിശ
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Dec 12, 20251 min read
ପୁନଶ୍ଚ ଧର୍ମପଦ
By Jyoti Prakash Mohanty ଝର ଝର ଝରିଯାଏ ଵାରୀଧାରା ଅବିରତ..ଅଶାନ୍ତ.. ଅଭିମାନୀ ଅନ୍ଧକାର ରାତ୍ରୀ ଆଜି ଅନ୍ତଃମୁଖୀ..! ଜକ ମକ ବିଜୁଳି ଆଲୁଅ ଟାଣିଦିଏ ଅଙ୍କାବଙ୍କା ରେଖା ଆକାଶର ନଗ୍ନ ଛାତି ପରେ.. ଘନ ଘନ ଉତ୍ତାଳ ପବନ ଥରେଈ ଦିଏ ଅସ୍ଥି ମଜ୍ଜା..ଆତ୍ମା ନିଜ ଭିତରର ଦୀର୍ଘଶ୍ୱାସ ଜାଳିଦିଏ କିଛି ଆଶା, କିଛି ସ୍ବପ୍ନ ନିଜ ଗଢ଼ା କୋଣାର୍କ ଚୂଡ଼ାରେ ବସି ଧର୍ମପଦ ନିଜର ଅସ୍ତିତ୍ବ ଖୋଜେ ! କୁହୁଳି କୁହୁଳି ଲିଭି ଆସୁଥିବା ସ୍ୱାଭିମାନକୁ, ଅହଂକାରର ଅଗ୍ନୀ ଦିଏ.. ସାମାନ୍ୟତାର ପ୍ରତିବଦଳରେ, ଅସଧାରଣତାର ବଳିଦାନ ଆକାଂକ୍ଷାକୁ..ଅଟ୍ଟହାସ୍ୟ କରେ ! ଅଶାନ୍ତ ବାରୀଧାରା ଅନ୍
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Dec 12, 20251 min read
चलो दूर कहीं हम चले
By Jyoti Prakash Mohanty चलो दूर कहीं हम चले ग़म की जहाँ परछाई ना हो.. चलो दूर कहीं हम चले जहाँ जमाने की रुसवाई ना हो.. चलो दूर कहीं हम चले सआदत की जहाँ कमी ना हो.. चलो दूर कहीं हम चले जहाँ आँखों में तेरी नमी ना हो.. चलो दूर कहीं हम चले हर पल जहाँ हो ख़ुशनुमा.. चलो दूर कहीं हम चले जहां इश्क़ की जलती रहे शमा.. चलो दूर कहीं हम चले हर शब-ए-वस्ल हो तेरी मेरी.. चलो दूर कहीं हम चले जहाँ हर ख़्वाब अधूरी हो पूरी..! By Jyoti Prakash Mohanty
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Dec 12, 20251 min read
झोंका… पवन का
By Jyoti Prakash Mohanty अभी अभी जो गुजरा यहाँ से एक पवन का झोंका था शायद बेबाक़ इतना चंचल चला वो कुछ क्षण तेरे संग रुका था शायद ! आँचल में तेरे भँवर बना के बिखरी ज़ुल्फ़ों के लहरें उड़ा के नंगी पीठ पर उँगली फिरा के कमर के नीचे थपकी लगा के तेरे शरीर के कण कण छू के यूँ ही मचलता चला था शायद ! पर..बाहों में मेरी आया नहीं वो बन के महक छाया नहीं वो मोड़ पे रुक के मुड़ा नहीं वो तेरी तरह कुछ ख़फ़ा था शायद…! By Jyoti Prakash Mohanty
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Dec 12, 20251 min read
दास्तान
By Jyoti Prakash Mohanty आज अपनी दास्तान सुनाने नहीं तेरी कहानी सुनने आया हूँ जो किसी को ना सुनाया हो वो तेरी ज़ुबानी सुनने आया हूँ ..। कुछ शिकायतें..कई सारी शिकवे जो बता ना पाये उन आँखों ने उनसे रूबरू होने आया हूँ ..। दो बूँद सजल मोती जो पलकों को चुभते रह गये उन्हें हथेली में समेटने आया हूँ ..! कुछ हल्की सी मुस्कुराहट जिन्हें घने कोहरे ने छुपाके रखा उन्हीं से ख़ुद को गुदगुदाने आया हूँ ..! आज अपनी दास्तान सुनाने नहीं बस तेरी कहानी सुनने आया हूँ …! By Jyoti Praka
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Dec 12, 20251 min read
मेरी कविता
By Jyoti Prakash Mohanty मैं शब्दों को बहने देती हूँ वे कहाँ से आते हैं? मेरे हृदय अथवा आत्मा या कहीं और से, मुझे नहीं पता। मैं उन्हें अपने दिमाग में छाँटती हूँ, उन्हें यथासंभव खूबसूरती से व्यक्त करने की कोशिश करती हूँ हालाँकि यह आसान नहीं है। मैं दर्द से गुज़रती हूँ परिणाम पसंद करती हूँ अधिक बार नापसंद करती हूँ मैं कोशिश करती हूँ और फिर से कोशिश करती हूँ टूटे शब्दों की डोरी के साथ टूटे हुए फ्रेम के साथ भावनाओं को आकार देती हूँ, बेहतर परिणाम की उम्मीद करती हू
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Dec 12, 20251 min read
बेरंग
By Jyoti Prakash Mohanty आज रंग दे मोहे सिर से ले कर पाँव तक हर धूप और छाँव तक लाल..हरा..पीला..गुलाबी..श्वेत हर एक रंग से रंग दे..! मेरे काँपते साँसों को ख़ुशबूओं से रंग दे मेरे शरीर के ठंडक को अपनी हरारत से रंग दे मेरे बिखरे सपनों को ढेरों उमंगों से रंग दे जीवन के बचे हुए क्षणों को अपनी आकृति से रंग दे या फिर.. अपने आग़ोश में भर ले मेरे सारे रंग हर ले आज मोहे बेरंग कर दे ! By Jyoti Prakash Mohanty
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Dec 12, 20251 min read
आठवणी
By Varsha Tikone न कळत त्या वाटेवर चालताना सडा सांडला आठवांचा... जुन्याच त्या क्षणांचा डाव मनी पुन्हा मांडला... भूतकाळाची अलगद भुरळ पडली वर्तमानाला... गोड त्या आठवणी आज नव्याने फुलू लागल्या... सरसावले आज पुन्हा एकदा त्यात गुंतण्या... अन् भानावर आले कड डोळ्यांची ओलावता... न कळत त्या वाटेवर चालताना सडा सांडला आठवांचा... जुन्याच त्या क्षणांचा डाव मनी पुन्हा मांडला... By Varsha Tikone
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Dec 12, 20251 min read
जग उभे ठाकले सामोरी
By Varsha Tikone ना निराशा ना हताश तोही..... ना साथ कोणाची एकच कल्लोळ मनी... अपेक्षाभंग करण्या मात्र जग उभे ठाकले समोरी... कनिष्ठ विचार चिरडण्या पाऊले सरसावली.... मोडून टाकण्या रीत जगाची वाटसरू चाल करी.... वाट रोखण्या मात्र जग उभे ठाकले सामोरी.... नवी उमेद उरी घेऊनी बांधली नवी विचारसरणी... घडविण्या समाज नवा झालो महत्वकांक्षी..... चिरडण्या विचार मात्र जग उभे ठाकले सामोरी.... ....जग मर्जी झिडकारुन निघाला बदलण्या रीत जगाची... By Varsha Tikone
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Dec 12, 20251 min read
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