ghazal

सफर की हिदायतों को ताक़ पर रखते हुए
ये कहाँ आ गए हम बेसबब भटकते हुए

कोई मज़हब का पहलू निकाला ना जाये
डर रहे हैं हम बच्चों के नाम रखते हुए

तमाम मुश्किलों के बाद भी देखा नहीं
जो उसूलों पे चले हों उन पाँवों को थकते हुए

सफर बदन भर का गोया मुकम्मल हुआ है
लहू खूब मुस्कुरा रहा है आँख से टपकते हुए

हमारी नज़र में एक अदब है पाक़ीज़गी है
हमने देखा है बेटियों की उम्र को पकते हुए

ग़ज़ल ओ अदब की महफ़िल में कैसे आएगी
जवानी जो शामें बिताती है पब में थिरकते हुए

अब सुकूँ मिलता नहीं ज़माने भर की तरक्कियों से भी
दिल बहल जाता था कभी तसव्वुर की परियों से भी

एक गुल ए बहार की पज़ीराई में लगे हैं सब के सब
चमन की रौनक बनी है भवरों से भी तितलियों से भी

मोहब्बत इसलिए कर रहा हूँ कि कोई दिल दुखाये मेरा
दिल ऊबने लगा है अब तो ज़िन्दगी की खुशियों से भी

समंदर के रवैये पे नाराज़गी लाज़िम सी बात थी मगर
कुछ एक सवाल किये जाने चाहिए थे कश्तियों से भी

मैंने देखा है कि हर सपने को हकीकत बना देती हैं
उम्मीद रख कर देखिये तो सही अपनी बेटियों से भी

क्या तुमसे राज़ रखने मेरे अज़ीज़ मेरे दोस्त ‘साकी’
कहानी साझा की है हमने बिस्तरों से तकियों से भी

ख़याल उसका ज़हन से निकल ही जायेगा शायद
अदना सा दिल ही तो है बहल ही जायेगा शायद

बुरा चल रहा हो या अच्छा खूबी ये है वक़्त की
बदलना आता है इसको बदल ही जायेगा शायद

ज़िंदगानी अब तकमील पहले सी तो नहीं होगी पर
काम चलाना है फ़क़त काम चल ही जायेगा शायद

आँखों ने दिल के सितम कितनी मुद्दत से उठाये हैं
अश्क़ कुछ देर बहेगा पर संभल ही जाएगा शायद

उसे लगा होगा उससे हाथ छूटा तो डूब जाऊंगा मैं
मुझे उबरते हुए देखेगा तो जल ही जायेगा शायद

दर्द ए इश्क़ की तपन सूरज सी लग रही है हमको
वो ढल जाया करता है ये भी ढल ही जायेगा शायद

आज की रात रहने दे मुझको मैखाने में ही ‘साकी’
दिल अभी भरा नहीं ये घर कल ही जायेगा शायद

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