Ghazals of Saaki

दस्तूर ए दर्द ए इश्क़ को शिद्दत से निभाना होगा
ज़ख्म जितना गहरा होगा उतना मुस्कुराना होगा

मैं तो अज़ल से हशर तक उसे मोहब्बत करूँगा
वो मुझे किस हद में चाहे उसका अपना पैमाना होगा

वो दौर और था कि दिल मिले इश्क़ मुकम्मल हुआ
अब तो दिल लगाने के लिए भी दिमाग लगाना होगा

दोस्तों मत कहो उसे बेवफा के क्या पता यूँ हुआ हो
इश्क़ कोई खेल लगा होगा उसे दिल बहलाना होगा

हाँ इश्क़ दरिया है मगर अलग रस्मो रिवाज़ हैं इसके
जिसको इससे पार जाना होगा उसको डूब जाना होगा

ये भी जरुरी है कि लोगों से राब्ता रहे
मगर मिलो तो मिलने में फासला रहे

अभी सब उसकी आवाज़ के नशे में हैं
उससे कह दो की वो झूठ बोलता रहे

परखिये उम्र भर दूसरों को क्या बुरा है
मगर सामने खुद के भी कभी आइना रहे

नशा शोहरतों का शराब के नशे से सीखे
रात को चढ़ा करे सुबह को उतरता रहे

जुदाई की रस्में भी निभानी पड़ सकती हैं
मगर लौट आने का भी कोई रास्ता रहे

मेरी ये ख्वाहिश कि आकर गले से लगे वो
उसे ये शौक कि बस दरीचों से देखता रहे

बाप की जायदादों पे दावा करने वालों कहो
माँ की मायूसी में किसका कितना हिस्सा रहे

हमने कहाँ कश्तियों की किसी से मांग की है
दरिया पार करने को बस एक तिनका रहे

वो आँखों से ओझल हुआ तो नज़र को रोना पड़ा
पल दो पल की बात ना थी उम्र भर को रोना पड़ा .

मैं इस क़दर रोया उससे बिछड़ कर कि मज़बूरी में
मेरा दिल रखने के लिए उस पत्थर को रोना पड़ा

जैसे उसके होने से ही सब रंगतें थीं आबो हवा में यहाँ
एक शख्स रुखसत क्या हुआ सारे शहर को रोना पड़ा

कोई खुशबुओं का तलबगार हिज़्र के आंसू दे गया
फूल तो मूरत पे चढ़ा दिया गया शज़र को रोना पड़ा

हवाओं के ही कारनामे थे ये वक़्त बेवक़्त के तूफ़ान
लाचार कश्तियों की मौत पर समंदर को रोना पड़ा

हार जाने का सबब हमारी नाकाबिलियत ही थी मगर
दिल की तसल्ली के लिए अपने मुक़द्दर को रोना पड़ा

एक रोती हुई माँ की दबी दबी सी सिसकियाँ सुन कर
देवता का दिल पिघला मंदिर के पत्थर को रोना पड़ा

सवाल तो मुझ पर खड़े हुए हैं
फिर होश क्यूँ तुम्हारे उड़े हुए है

हिज़्र से इतनी शिकायत क्यूँ है
किसी से बिछड़े हैं तो तेरे हुए हैं

ज़माना क्या जिल्लतें देगा हमें
हम किसी की आँख से उतरे हुए हैं

शुक्रिया आपका आपने गिराया हमें
तो आज अपने पैरों पे खड़े हुए हैं

ये पत्थऱ जो मेरी राह में आ गए
किसी और की राह से हटे हुए हैं

जब से आयी है तरक्की की खबर
कुछ दोस्तों के मुँह लटके हुए हैं

ऐ दरख्त ए जाना न मुँह मोड़ हमसे
हम पत्ते तेरी ही शाख से टूटे हुए हैं

कैसे सच बोला जाये लिखा जाये
जुबाँ गिरवी है हाथ कटे हुए हैं

समंदर खूब तेवर दिखा रहा है
मल्लाह भी ज़िद पे अड़े हुए हैं

ईमान का और क्या सबूत दूँ
मेरे पैरों में छाले पड़े हुए हैं

रईस क़ातिलों के अंदाज़ देखिये
खंज़र में जवाहरात जड़े हुए हैं

शौक हमें भी है आसमानी सफर का
मगर हम दरख़्त ज़मीन से जुड़े हुए हैं

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