Mere andar ek zamaana hai

ब ाँध के न रख सकेंमुझेप यल की बेड़िय ाँ,
न आज़म ओ मुझपर और कोई तरक़ीड़बय ाँ…
अल्हि मस्त नदी के जैसी चंचल मेरी शोखखय ाँ,
ख्व ड़िशो के समंदर मेंिैंअरम नो की कु छ डुबड़कय ं…
गिनोंऔर उपि रोंसेबढ़कर मुझेसपनो की च ित िै…
और मेरेसपनो को अक्सर सच िोनेकी आदत िै|
न ड़कसी सेबैर िैमेर , न दू ज कोई परव न िै…
खुद सेिी जीतनेकी ड़ज़द िैबस और खुद को िी िर न िै…
मत समझन भीि मुझेइस दुड़नय की,
मेरेअंदर एक ज़म न िै…
PS – Last three lines are from a urdu Shaayri that I found on web…but I always used to find it incomplete. This poem is an attempt to cover the entire essence that I associate with these powerful lines.

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