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कलम

Updated: Jan 18


By Santosh Kanoujia


मन के जज़्बात को, तुम्हारे एहसास को 

काग़ज़ पर है रखती..

इंसान को इंसान से ज़्यादा, 

ये कलम है समझती ।


भावनाओं को तेरी, जैसी संगत ने भिगोया

कलम ने शब्दों को,वैसी रंगत मे डुबोया

बिखरे तेरे ख्यालों के मोतियों को

कभी आंसूओं की कभी मुस्कुराहटों की, माला मे पिरोया ।


जो जुबां से बयां न हो पाया

विचलित मन जिसे भीतर ठहरा न पाया

दुविधाओं को बड़ी सुविधाओं से,

तेरे भीतर के संघर्ष को, कलम ने निष्कर्ष तक पहुंचाया ।


By Santosh Kanoujia



9 commentaires

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Sunder Lal
Sunder Lal
10 févr.
Noté 5 étoiles sur 5.

Beautiful words

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Noté 5 étoiles sur 5.

यह वास्तव में सुंदर हैं। मुझे आशा है कि आप जानते हैं कि आप कितने प्रतिभाशाली हैं। आपको ये कविताएँ लिखती रहनी चाहिए ।

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Noté 5 étoiles sur 5.

वाह!! उत्कृष्ट रचना , आनंद आ गया पढ़ कर।

क्या बेहतरीन ढंग से शब्दों को पिरोया है क्या लयात्मकता है!!

आप बहुत ही मधुर व सुखद लिखते हैं।

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sumit preeti
sumit preeti
22 janv.
Noté 5 étoiles sur 5.

बहुत बढिया

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Ashwani
Ashwani
21 janv.
Noté 5 étoiles sur 5.

काफी सुन्दर कविता है। 🫶🏻💕✨

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