चिट्ठियाँ खो गईं!
- hashtagkalakar
- Dec 28, 2022
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By Shivam Mishra
चिट्ठियाँ खो गईं! साथ ही खो गईं तुम्हारी यादें जो न जाने क्यूँ मगर बड़े जतन से संजो के रखी थीं मैंने अलमारी की ऊपर वाली दराज़ पर बिछे अखबार के नीचे। हर इतवार सफ़ाई करते वक्त, उस ऊपर वाली दराज़ को छोड़ देता था मैं शायद डरता था, कि कहीं कोई चिट्ठी, यकायक तुम्हारी आवाज़ में, कुछ बोल न पड़े।
इस वजह से, बहुत धूल जमा हो गयी थी उनपर, बिल्कुल हमारे रिश्ते की तरह। पर पिछले इतवार, बहुत हिम्मत जुटा कर धूल से सनी, सारी चिट्ठियाँ उठाकर मैं बाहर ले आया, और ज्यों ही, उनपर से धूल उड़ाने को, मैंने एक ज़ोर की फूँक मारी त्यों ही चिट्ठियाँ खो गईं! अचानक! शायद धूल के सिवा, कुछ बचा ही नहीं था उनमें, बिल्कुल हमारे रिश्ते की तरह।
By Shivam Mishra
The last paragraph was just especially beautiful
Khubsurat alfazo ka chayan