top of page

चिट्ठियाँ खो गईं!

By Shivam Mishra


चिट्ठियाँ खो गईं! साथ ही खो गईं तुम्हारी यादें जो न जाने क्यूँ मगर बड़े जतन से संजो के रखी थीं मैंने अलमारी की ऊपर वाली दराज़ पर बिछे अखबार के नीचे। हर इतवार सफ़ाई करते वक्त, उस ऊपर वाली दराज़ को छोड़ देता था मैं शायद डरता था, कि कहीं कोई चिट्ठी, यकायक तुम्हारी आवाज़ में, कुछ बोल न पड़े।


इस वजह से, बहुत धूल जमा हो गयी थी उनपर, बिल्कुल हमारे रिश्ते की तरह। पर पिछले इतवार, बहुत हिम्मत जुटा कर धूल से सनी, सारी चिट्ठियाँ उठाकर मैं बाहर ले आया, और ज्यों ही, उनपर से धूल उड़ाने को, मैंने एक ज़ोर की फूँक मारी त्यों ही चिट्ठियाँ खो गईं! अचानक! शायद धूल के सिवा, कुछ बचा ही नहीं था उनमें, बिल्कुल हमारे रिश्ते की तरह।


By Shivam Mishra



Recent Posts

See All

2 Comments

Rated 0 out of 5 stars.
No ratings yet

Add a rating
Shashwat Shukla
Shashwat Shukla
Jan 12, 2023

The last paragraph was just especially beautiful

Like

Unknown member
Jan 11, 2023

Khubsurat alfazo ka chayan

Like
SIGN UP AND STAY UPDATED!

Thanks for submitting!

  • Grey Twitter Icon
  • Grey LinkedIn Icon
  • Grey Facebook Icon

© 2024 by Hashtag Kalakar

bottom of page